Pandit für Gayatri Mantra Jaap in Kalkutta: Kosten, Vidhi und Buchung
Das Rezitieren des Gayatri-Mantras mit der korrekten vedischen Aussprache und dem richtigen Rhythmus ist eine der wirksamsten spirituellen Praktiken im Hinduismus.
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हमारी इस भारतीय संस्कृति में पूजा करने के लिए अनेक प्रकार के रीति – रिवाजों को मानने की परंपरा है| Urnenverehrung भी उन्ही में से एक है| हिन्दू धर्म के लोगों के लिए मांगलिक कार्यों और पूजा – पाठ के दौरान कलश पूजा बहुत ही विशेष महत्व है|
शास्त्रों के अनुसार यह बताया गया है कि कलश को वैभव और सुख – समृद्धि का प्रतीक माना जाता है| कलश की स्थापना के बारे में वर्णन देवी पुराण में बताया गया कि किसी भी भगवान की पूजा करने Ja कलश स्थापित करके कलश पूजन किया जाता है|
सभी धार्मिक कार्यों में कलश का बहुत बड़ा महत्व माना गया है| जैसे कि सभी मांगलिक कार्य, नए व्यापार की शुरुआत, गृह प्रवेश पूजा, दीवाली पूजन, नववर्ष प्रारम्भ, यज्ञएवं अनुष्ठान के अवसर पर सबसे पहले कलश को कलश पूजन Ja स्थापित किया जाता है|

Navratri के समय नौ दिनों तक मंदिरों और घरों में कलश को स्थापित करके कलश और देवी दुर्गा की पूजा की Ja है| कलश में भरा हुआ पवित्र जल लोगों को इस बात का संकेत देता है| सभी इस जल की भांति ही अपने मन को भी शीतल और स्वच्छ रखना चाहिए और किसी भी व्यक्ति के प्रति स्वार्थ की भावना ना रखे| हमे अपने मन को श्रद्धा, सरतला और संवेदना के भरकर रखना चाहिए|
पौराणिक कथाओं के अनुसार मनुष्य के शरीर की तुलना भी मिट्टी के कलश से की गई है| कलश के समान ही इस शरीर में भी प्राण रूपी जल भरा हुआ है| जिस प्रकार बिना प्राण के इस शरीर को अशुभ माना जाता है उसी प्रकार ही खाली कलश को भी अशुभ ही माना जाता है| इसी वजह से कलश पूजन के समय पानी, दूध, आम्रपत्र (आम के पत्ते), अक्षत (चावल), अनाज, और नारियल आदि को Ja जाता है|
हिन्दू धर्म में सभी प्रकार की पूजा तथा धार्मिक अनुष्ठानों में सामग्री के साथ अन्य भी बहुत सारी वस्तुओं का इस्तेमाल किया जाता है| जैसे कि पानी, फूल, घंटी, शंख, आसन और कलश, जो कि हर पूजा में विशेष भूमिका निभाते है|
हिन्दू धर्म में किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के लिए कलश को पूजन के लिए स्थापित किया जाता है| हमारी इस भारतीय संस्कृति में कोई भी बिना कलश पूजन के प्रारम्भ नहीं किया जाता है| शास्त्रों के अनुसार कलश को इस समस्त ब्रह्माण्ड के प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है|
कलश पूजन के सम्बंधित वैज्ञानिक रहस्यों में यह बताया गया है कि किसी भी धार्मिक कार्यों व मांगलिक कार्यों में कलश पूजन के समय कलश में Ja (जल) भरा जाता है| कलश एक ऊर्जा के पिंड के समान होता है|
भारतीय हिन्दू संस्कृति में नवरात्रि के समय घर और मंदिरों में कलश पूजन के लिए कलश की स्थापना की जाती है| उसके पश्चात इस कलश के सामने ही व्यक्ति अपनी श्रद्धा के अनुसार तंत्र, मंत्र से साधना करता है| इस समय कलश को दैवीय शक्ति का रूप ही माना जाता है| यह कलश इतना पवित्र है कि इसे छूने मात्र से ही व्यक्ति के सारे दुःख और कष्ट दूर हो जाते है|
हमारे धर्म ग्रंथों में कलश के बारे में वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु की नाभि कमल से इस Ja की उत्पत्ति हुई है और कमल से ब्रह्मा जी की| कलश में रखे हुए जल को उस जल के भांति माना जाता है| जिस जल से इस सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पति हुई है|
सबसे पहले स्नान आदि से निवृत होकर पूजा स्थल पर चले जाए| उसके पश्चात सभी श्रेष्ठ कुल देवता, ग्राम देवता और इष्ट देवता व पितरो को प्रणाम करने के Ja शांति से आसन पर बैठे| उसके बाद में आचमण प्राणायाम के द्वारा अपने मन को शुद्ध अवश्य करे| फिर पूजा की शुरुआत करते है| कलश पूजन धन, सुख – समृद्धि, और सौभाग्य को बढ़ाने के लिए विशेष रूप से की जाती है|
इस पूजा को भगवान गणेश की कृपा प्राप्ति के लिए भी की जा सकती है| इस पूजा की सहायता से सभी कठिन कार्यों में सफलता प्राप्त की जा सकती है| यह पूजा करने से आपको सुख, शांति और समृद्धि का आशिर्वाद मिलता है|

कलश गणेश की पूजा हिन्दू धर्म में सबसे प्रचलित पूजा मानी जाती है| इस पूजा में एक कलश में जल को भरकर उसमे गणेश जी की प्रतिमा को स्थापित किया जाता है| इस पूजा को धन और समृद्धि पाने के लिए की जाती है|
भूरसि भूमिरस्यदितिसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री । पृथिवीं यच्छ पृथिवींदृ र्ठ ह पृथिवीं माहि र्ठ सीः ॥१॥
ॐ महीद्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् पिपृतान्नो भरीमभिः।
ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणायत्वो दानायत्वा व्यानात्वा ।
दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धान देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृहभ्णा त्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषेत्वा महीनाम्पयोऽसि ॥
ओषधयः समवदन्त सोमेन सहराज्ञा ।
यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्त र्ठ राजन् पारयामसि ॥
ॐ आजिघ्र कलशंमह्या त्वा विशन्त्विन्दवः।
पुनर्जा निवर्त्तस्वसानः सहस्रं धुक्ष्वोरुघारा पयस्वती पुनर्माविशताद्रयिः॥
वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भ सर्जनीस्थो वरुणस्य ऋत सदन्यसि वरुणस्य ऋत Ja वरुणस्य ऋतसदनमासीद ॥
ॐ आकलेशु धावति पवित्रे परिषिच्यते उक्थैर्यज्ञेषु वर्धते
इमंमे यमुने सरस्वति शुतुद्रिस्तोमं सचतापरुष्णया ।
असिकन्या मरुद्वृथे वितस्तयार्जीकीये शृणुह्यासुषो मया॥
या: ओषधी : पूर्वाजाता देवभ्यस्त्रियुगं पुरा।
मनैनु बभ्रूणामह र्ठ शतं धामानि सप्त च॥
गंधद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्
ईश्वरी सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥
पवित्रस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्व: प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। तस्यते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुनेतच्छकेयम्।
ॐ स्योना पृथिवी नो भवानृक्षरा निवेशनी। यच्छा नः शर्म सप्रथाः ॥
ॐ या फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणी। बृहस्पतिः प्रसूतास्तानो मुञ्चत्व र्ठ हसः॥
उतस्मास्यद्रवतस्तुरण्यत्तः पर्णन्नवेरनुवाति प्रगर्द्धिनः । श्येनस्ये वजतोऽ अंक संपरिदधि क्राव्णः सहोर्जातरित्रतः स्वाहा
ॐ सहिररण्यनानि दाशुषेसुवातिसविता भगः। तं भागं चित्रमीमहे ॥
ॐ परिवाजपतिः कविरग्नि हव्यान्य क्रमीत । हिरण्यप्रेक्षण-दधद्रनानि दाशुषे ॥
युवा सुवासाः परिवीतऽआगात्स ऽउश्रेयान् भवति जायमानः।
तं धीरा सः कवय ऽउन्नयन्ति स्वाध्योमनसा देवयन्तः॥
ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमादत्स्वः।
वासो अग्ने विश्वरूप र्ठ सव्ययस्वः विभावसो॥
ॐ अस्य तत्वायामीत्यस्य शुनः शेष ऋषि त्रिष्टुप्छन्दः वरुणो देवतावाहने विनियोगः।
इस मंगल कलश को समुंद्र मन्थन का प्रतीक भी माना जाता है| सुख और समृद्धि के प्रतीक इस कलश को घड़े के नाम से भी जाना जाता है| हिन्दू धर्म में जल को बहुत ही पवित्र माना जाता है| इसी कारण से जल को किसी भी पात्र में भरकर मंदिर में अवश्य रखा जाता है|
इससे पूजा में सफलता प्राप्त होती है| इस कलश को उसी तरह से निर्मित किया गया है| जिस तरह से समुंद्र मन्थन में मंदराचल को मथ कर अमृत को निकला गया था| यह कलश जो होता है| इसे भगवान विष्णु और इसके जल को क्षीरसागर के समान माना गया है|
हिन्दू धर्म के शास्त्रों के अनुसार कलश में जल भरकर उसको ईशान कोण में रखने से घर में सुख समृद्धि बढ़ती है| इसलिए मंगल कलश के रूप में पवित्र जल की स्थापना घर में की जाती है| अत: घर में ईशान कोण के स्थान को हमेशा खाली ही रखना चाहिए| और उस स्थान पर हमेशा ही मंगल कलश की स्थापना की जानी चाहिए|
मान्यता है कि तांबे के पात्र में जल भरकर रखने से उस पात्र में से विद्युत चुम्बकीय Ja उत्पन्न होती है| कलश और जल दोनों के सम्मिलन से एक अद्भुत ब्रह्मांडीय ऊर्जा के समान ही वातावरण निर्मित होता है| जो कि वातावरण को दिव्य बनाता है| इस मंगल कलश में जो सूत बांधा जाता है|
वह सूत ऊर्जा को बांधकर वर्तुलाकार वलय की संरचना का निर्माण करता है| इस प्रकार से ही सकारात्मक और शुद्ध वातावरण निर्मित होता है| जो धीरे – धीरे सम्पूर्ण घर में फैल जाता है| कलश से सम्बंधित एक पौराणिक कथा भी है| जिसमें समुद्र मंथन के समय अमृत से भरा हुआ कलश ही सभी देवताओं और असुरों से सामने प्रकट हुआ था|
हमारे धर्म ग्रंथों में कलश के बारे में वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु की नाभि कमल से इस Ja की उत्पत्ति हुई है और कमल से ब्रह्मा जी की| कलश में रखे हुए जल को उस जल के भांति माना जाता है| जिस जल से इस सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पति हुई है| कलश के शास्त्रीय धार्मिक आधार है|
कलश जलपात्र होता है| और जल के बिना किसी भी मनुष्य का जीवन संभव नहीं है| जिस घर मे मांगलिक कार्यों में कलश पूजन किया जाता है| उस घर में हमेशा ही सुख – समृद्धि बनी रहती है| इस मंगल कलश को समुद्र मंथन का प्रतीक भी माना जाता है|

पौराणिक कथाओं के अनुसार मनुष्य के शरीर की तुलना भी मिट्टी के कलश से की गई है| कलश के समान ही इस शरीर में भी प्राण रूपी जल भरा हुआ है| जिस प्रकार बिना प्राण के इस शरीर को अशुभ माना जाता है उसी प्रकार ही खाली कलश को भी अशुभ ही माना जाता है| किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले कलश में जल भरकर कलश का पूजन किया जाता है|
इसके द्वारा व्यक्ति जल को उसके प्रति अपना आभार प्रकट करता है| सभी जानते है कि इस संसार में जल के बिना जीवन संभव नहीं है| इस संसार में जल ही एक ऐसा तत्व है जिसका कोई आकार निश्चित नहीं है|
आज हमने इस आर्टिकल के माध्यम से Urnenverehrung के बारें में काफी बाते जानी है| आज हमनेकलश पूजन के फ़ायदों के बारे में भी जाना| हम उम्मीद करते है कि हमारे द्वारा बताई गयी जानकारी से आपको कोई ना कोई मदद मिली होगी|
इसके अलावा भी अगर आप किसी और पूजा के बारे में जानकारी लेना चाहते है। तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर जाकर सभी तरह की पूजा या त्योहारों के बारे में सम्पूर्ण जानकारी ले सकते है|
किसी भी तरह की पूजा करने के लिए हमें बहुत सारी तैयारियां करनी होती है| गावों में पूजा आसानी से हो जाती है लेकिन शहरों में लोगों के पास समय की कमी होती है| जिस वजह से वह लोग पूजा नहीं करवा पाते है तो उनकी इस समस्या का समाधान हम लेकर आये है 99Pandit के साथ| यह सबसे बेहतरीन प्लेटफार्म है जिससे आप किसी पूजा के लिए ऑनलाइन पंडित जी को बुक कर सकते है|
Q.कलश पूजा कैसे की जाती है ?
A.सबसे पहले स्नान आदि से निवृत होकर पूजा स्थल पर चले जाए| उसके पश्चात सभी श्रेष्ठ कुल देवता, ग्राम देवता और इष्ट देवता व पितरो को प्रणाम करने के Ja शांति से आसन पर बैठे| उसके बाद में आचमण प्राणायाम के द्वारा अपने मन को शुद्ध अवश्य करे| फिर पूजा की शुरुआत करते है| कलश पूजन धन, सुख – समृद्धि, और सौभाग्य को बढ़ाने के लिए विशेष रूप से की जाती है|
Q.कलश की स्थापना करते समय कौन सा मंत्र बोला जाता है ?
A.इस समय पर 'ऊं भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्रीं, पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृग्वंग ह पृथिवीं मा हि ग्वंग सीः मंत्र पढना चाहिए|
Q.Was ist los mit dir?
A.इस संसार में जल के बिना जीवन संभव नहीं है| इस संसार में जल ही एक ऐसा तत्व है जिसका कोई आकार निश्चित नहीं है| किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले कलश में जल भरकर कलश का पूजन किया जाता है| इसके द्वारा व्यक्ति जल को उसके प्रति अपना आभार प्रकट करता है|
Q.कलश के नीचे क्या रखना चाहिए ?
A.माना जाता है कि कलश पूजन करते समय कलश के नीचे गेहूं और चावल के दाने रखे जाते है|
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