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Utpanna Ekadashi Vrat Katha: उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

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99PanditJi Geschrieben von: 99PanditJi
Zuletzt aktualisiert am:17. Januar 2024
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Weitere Informationen finden Sie hier: हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है| पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के नाम से जाना जाता है| मान्यताओं के अनुसार इस एकादशी में भगवान विष्णु के साथ ही देवी एकादशी की पूजा भी की जाती है| यह उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) व्रत तथा पूजन भगवान श्री विष्णु को समर्पित माना जाता है|

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

इस उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के बारे में एक मान्यता है जो कि काफी पुराने समय से चली आ रही Ja 11 Tage vor dem Ende der Woche शरीर से एक देवी उत्पन्न हुई थी| इसलिए इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के नाम से जाना जाता है| आज हम लेख के माध्यम से आपको उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के महत्व एवं उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा (Utpanna Ekadashi Vrat Katha) के बारे में आपको बताएँगे|

इसके आलवा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे ऋण मुक्ति पूजा (Rin Mukti Puja), विवाह पूजा (Hochzeits-Puja), तथा नवग्रह शांति पूजा (Navgraha Shanti Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है| Es ist nicht einfach Whatsapp पर भी हमसे संपर्क कर सकते है|

उत्पन्ना एकादशी का महत्व – Bedeutung von Utpanna Ekadashi

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से Keine Sorge! मैंने कार्तिक शुक्ल एकादशी जिसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है, के बारे सम्पूर्ण विस्तार से सुना है| किन्तु आप अब मुझे मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में बताइए कि इस एकादशी का Was ist los? Was ist los? इसकी व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है|

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण बोले कि मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के नाम से जाना जाता है| शंखोद्धार तीर्थ स्थान में स्नान करके भगवान के दर्शन करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, Nein उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) व्रत करने के समान होता है| माना जाता है कि उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) व्रत करने वाले व्यक्ति को चोर, निंदक अथवा झूठ बोलने वाले लोगों से दूर रहना चाहिए| इस उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा (Utpanna Ekadashi Vrat Katha) को सुनने का ही महत्व बताया है| जिसे अब मैं तुमसे कहूंगा|

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा – Utpanna Ekadashi Vrat Katha

सतयुग काल में एक मुर नाम का राक्षस उत्पन्न हुआ| वह इतना शक्तिशाली था कि दैत्य इंद्र, आदित्य, वसु, वायु तथा अग्नि आदि सभी देवताओं को पराजित Nein दिया था| उसके राक्षस के आतंक से परेशान होकर सभी देवतागण भगवान शिव के पास गए तथा उन्हें पूरा Nein बताते हुए कहा कि हे महादेव ! मुर दैत्य से भयभीत होकर देवता मृत्यु लोक में फिर रहे है| इस भगवान शिव ने कहा – हे देवताओं ! आप सभी इस सृष्टि के पालनहार, अपने भक्तों के दुखों को दूर करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाओ|

इसमें वह आपकी सहायता अवश्य करेंगे| भगवान शिव के कहने पर सभी देवता भगवान विष्णु के पास सहायता के लिए पहुंचे| भगवान विष्णु को शयन करते हुए देखकर सभी देवतागण उनकी स्तुति करने लग गए तथा उनसे कहा Ja देवताओं की रक्षा करने वाले मधुसूदन ! आपको नमस्कार है| कृपया आप हमारी रक्षा करे| हम सभी देवता मुर राक्षस से भयभीत होकर आपकी शरण में आये है| आप ही इस सम्पूर्ण जगत के पालनकर्ता तथा संहार करने वाले है| आप ही सभी जीवो को शांति प्रदान करते है| आकाश और पाताल भी आप ही है| आप बिना एक संसार में चर तथा अचर कुछ भी नहीं है|

Ja! राक्षसों ने हमे पराजित करके स्वर्ग से बाहर भगा दिया है| हम सभी देवता उन असुरों से भयभीत होकर इधर-उधर भागते फिर रहे है| कृपया उनसे हमारी रक्षा करे| इंद्र देव को भयभीत देखकर भगवान विष्णु ने उनसे पूछा कि हे इन्द्रदेव ! ऐसा कौन मायावी राक्षस आया है जिसने सभी देवताओं को पराजित कर दिया, वह कितना बलशाली Ja, ja तथा किसकी शरण में है| यह सब मुझे बताओ| भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर इंद्रदेव ने कहा Ja! प्राचीन काल में एक नाडीजंघ नामक राक्षस था| यह राक्षस उसी का पुत्र है तथा इसका नाम मुर है|

इसने सभी देवताओं को पराजित कर स्वर्ग से बाहर निकल दिया तथा अब स्वयं स्वर्ग लोक पर अपना Ja करके बैठा है| उसने इंद्र, अग्नि, यम, वायु, चंद्रमा, आदि सबके स्थान पर अधिकार कर लिया है| Es ist nicht einfach स्वयं ही मेघ बना हुआ है| Ja! हम सभी आपसे विनती करते है कि राक्षस का वध करके देवताओं को अजेय बनाइये|

देवताओं द्वारा यह वचन सुनकर भगवान विष्णु ने कहा – हे देवताओं ! मैं अतिशीघ्र ही उस असुर का संहार करूँगा| तुम सभी चन्द्रावती नगर जाओं| इसी के साथ भगवान विष्णु के सहित सभी देवताओं में चन्द्रावती नगर की ओर प्रस्थान किया| जब सभी देवता भगवान विष्णु के साथ वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि राक्षस मुर सेना सहित Ja प्रतीक्षा कर रहा था| युद्धभूमि में उस असुर मुर की गर्जना से सभी देवता भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे| जब भगवान विष्णु युद्धभूमि में आए तो सभी राक्षस उन पर भी आक्रमण करने लग गए|

किन्तु भगवान विष्णु ने सर्प की भांति उन सभी असुरों को अपने बाणों से मार दिया| युद्ध में बहुत सारे दैत्य मारे गए लेकिन मुर बच रहा| वह अविचल भाव से भगवान से युद्ध कर रहा था| भगवान विष्णु के द्वारा चलाए गए बाणों से पूरा शरीर छिन्न- भिन्न हो गया किन्तु इसके पश्चात भी यह युद्ध करता रहा| भगवान विष्णु तथा राक्षस मुर का युद्ध 10 हज़ार वर्षों तक चलता रहा लेकिन फिर भी वह राक्षस Ja हारा| इतने समय तक मुर से युद्ध करने की वजह से भगवान विष्णु थककर बद्रिकाश्रम चले गए|

उस स्थान पर एक हेमवती नामक बहुत ही सुन्दर गुफा स्थित थी| माना जाता है कि यह गुफा लगभग 12 योजन लम्बी तथा केवल इसका एक ही द्वार था| भगवान विष्णु उस गुफा में जाकर योगनिद्रा की गोद में जाकर सो गए| वह मुर राक्षस भी भगवान विष्णु के पीछे-पीछे उस गुफा में आ गया| भगवान विष्णु को सोया हुआ देख वह राक्षस भगवान को मारने के उद्यत हुआ| उसी क्षण भगवान विष्णु के शरीर से कांतिमय रूप वाली एक देवी प्रकट हुई| देवी ने उस असुर को ललकारा तथा उससे युद्ध करके उसे तत्काल ही मार दिया|

जब भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागे तो सारी बातें जानने के पश्चात भगवान विष्णु ने उन देवी से कहा कि आपने एकादशी के दिन जन्म लिया है अतः (Utpanna Ekadashi) के नाम से पूजित होंगी तथा जो मेरे भक्त होंगे, वह आपके भी भक्त होंगे|

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