ऑस्ट्रेलिया में हनुमान चालीसा पाठ के लिए पंडित: लागत, लाभ और विवरण
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गोवर्धन पूजा 2025 : पूरे भारत देश में सभी त्यौहार बड़े ही उत्साह के साथ मनाये जाते हैं। वेदों के अनुसार गोवर्धन पूजा का हिंदू धर्म में काफी महत्व है। यह त्यौहार कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है।
जिस प्रकार से हिंदू धर्म का त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है गो वर्धन पूजा 2025 को भी बड़े हर्षोउल्लास के मनाया जाता है। दिवाली का त्यौहार पांच दिनों तक मनाया जाता हैं।

गोवर्धन पूजा 2025 वाले दिन मंदिर अन्नकूट का भोग बनाया जाता है और भक्तों में बंटा जाता है। इस साल 20 सेकंड 2025 को है और गोवर्धन पूजा 22 सेकंड 2025 को है।
इस दिन गौ माता और उन्ही के साथ भगवान श्री कृष्ण की भी पूजा का विधान है। 21 सेकंड 2025 को प्रतिपदा तिथि शाम 05:54 से प्रारंभ 22 अक्टूबर 2025 को रात्रि 08:16 तक तक यह तिथि समाप्त हो जाएगी। इसलिए महिलाओं को इसी मुहूर्त में अपनी पूजा संपन्न करना आवश्यक है।
हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा का काफी बड़ा महत्व बताया गया है इस दिन भगवान श्री कृष्ण की पूजा करने के लिए उनके सबसे प्रिय पशु गौ माता और उनके शिष्यों के साथ पूजा की जाती है और भगवान से प्रार्थना की जाती है। इस दिन महिला गोबर से गोबर बनाकर उसे फूल आदि से सजाती है और उसकी पूजा करती है।
गोवर्धन पूजा का मानव जीवन से सीधा संबंध है। इसके बारे में काफी मिज़ाज और लोककथाओं में प्रमाण मिलते हैं। वेदो में गाय को गंगा नदी के समान ही पवित्र माना गया है।
गाय को माता लक्ष्मी का ही रूप माना जाता है जिस प्रकार की माता लक्ष्मी है जो कि धन देवी है वो अपने भक्तों को सुख समृद्धि प्रदान करती है।
हमने इस लेख में आपको गोवर्धन पूजा के बारे में लगभग संपूर्ण जानकारी प्रदान की है। अब हम आपको इस साल 2025 में गोवर्धन पूजा की तारीख और उसकी पूजा के लिए शुभ उत्सव बताएंगे।
तो प्रतिपदा तिथि 21 तारीख से शुरू हो जाएगी और अगले दिन 22 तारीख को ख़तम हो जाएगी। 22 . वस्तु को पूजा सबसे शुभ समय प्रातकाल: 06:28 AM से 08:45 AM तक रहेंगे। इसके बाद आपकी पूजा शुभ मुहूर्त समाप्त हो जाएगी तो ध्यान दें कि इस समय तक पूजा हो जाए।
| तारीख | तारीख | समय |
| प्रतिपदा तिथि शुरू | 21 सेकंड 2025 | 05: 54 PM |
| प्रतिपदा तिथि समाप्त | 22 सेकंड 2025 | 08: 16 PM |
हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा का काफी बड़ा महत्व है। गोबर पूजा वाले दिन महिलाएँ प्रातकाल: प्रारंभिक गोबर गोबर से गोबर जी की परतें उसके बाद उसे फूलों से गिरा देती हैं।
फिर गोवर्धन जी के पास दीपक जलाकर उनकी पूजा की जाती है। गोवर्धन पूजा वाले दिन भगवान श्री कृष्ण के साथ-साथ उनकी प्रिय गाय और उनके शेल्डो की भी पूजा की जाती है।
इस दिन गायो के साथ बेलों की भी पूजा की जाती है। इस दिन मंदिरो में अन्नकूट बंटता है। इसलिए इस दिन को अन्नकूट दिवस भी कहा जाता है।
इस दिन लोग बड़ी दूर से मथुरा में यहां गोवर्धन के दर्शन करने के लिए भी आते हैं। मथुरा भारत के उत्तर प्रदेश में स्थित है। गोवर्धन पर्वत को गिरिराज जी भी कहते हैं। यह मूल्यांकन 7 कोस यानि लगभग 21 मिनट की है।
लोगो का मानना है कि गोवर्धन पर्वत की झांकियों को भी भगवान का आशीर्वाद मिलना चाहिए।
लोगो का यह भी मानना है कि इसका अधूरा प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। बातचीत को बीच में आधा छोड़ना शुभ नहीं माना जाता है। गोवर्धन पूजा के एक दिन बाद ही आती है।
यह इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र देव के दरबार में चूर-चूर कर दिया था। कभी-कभी ऐसा होता है कि गोवर्धन पूजा के एक दिन या दो दिन आगे हो सकते हैं।
गुजरात के लोग इस त्यौहार को नए साल के रूप में मनाते है। अन्नकूट और दिवाली ये दोनों त्यौहार ही एक साथ आते है। तो इनके रीती रिवाज भी आपस में एक दूसरे से काफी जुड़े हुए हैं। इस पूजा में भी दिवाली की ही तरह पहले के 3 दिन पूजा पाठ करने वाले ही होते हैं।
इस दिन प्रात काल: जल्दी उठकर तेल को अच्छे मलकर नहाने की काफी पुरानी प्रथा चली आ रही है। इसके पश्चात पूजा सामग्री को तैयार करके पूजा स्थान पर चले जाए और वहाँ आराम से सर्वप्रथम अपने कुल देवी या देवताओं का ध्यान कीजिए।
उसके बाद पूर्ण श्रद्धा से गोबर से गोबर पर्वत बनाया गया। शास्त्रों में बताया गया है कि इसका शीर्ष लेटे पुरुष के समान होना चाहिए।

इसके बाद बनी हुई टॉप को फूल, स्टीन और टहनी और गाय की टॉपियों से जोड़ा गया है।
गोवर्धन की आकृति को बनाकर उसके बिलकुल बीच में भगवान श्री कृष्णा को रखा जाता है और इसके बीच में एक गड्ढा बनाया जाता है फिर उसके अंदर दूध, दही, और गंगाजल के साथ ही शहद भी डाला जाता है और पूजा की जाती है। इसके बाद प्रसाद को लोगो में बाँट दिया जाता है।
इसी के साथ ही गायो को भी सजाने की भी प्रक्रिया है। यदि आपके आस पास कोई गाय हो उसे अच्छे से नहलाकर तैयार करे। उसका अच्छी तरह से श्रृंगार करे और उसके सिंघो पर घी लगाए तथा उससे गुड़ खिलाए और उसे प्रणाम करके आशीर्वाद प्राप्त करे।
गौ माता की अच्छे से पूजा करने पर श्री कृष्ण के साथ – साथ माता लक्ष्मी भी प्रसन्न होती है। पूजा को अच्छे प्रकार पूर्ण कर लेने के बाद गोवर्धन के सात बार परिक्रमा करे। एक व्यक्ति अपने हाथ में जल का लोटा और दूसरा व्यक्ति अपने हाथ में जौ लेकर चलता है।
जल वाला व्यक्ति आगे आगे जल गिराता जाता है और दूसरा व्यक्ति जौ गिराता यानि जौ बोता हुआ परिक्रमा करता है इस पूजा को सच्ची श्रद्धा से करने वालो के लिए ये काफी लाभदायक है।
हिन्दू धर्म में 56 भोग का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। इसके बारे में तथ्य काफी रोचक कहानियाँ हैं। पुराणों में बताया गया है कि भगवान श्री कृष्ण एक दिन में कुल 8 बार भोजन करते थे।
जब भगवान ने इंद्र देव के क्रोध से भगवान ने गोवर्धन को अपनी कनिष्टा अंगुली से उठाया तो श्री कृष्ण उस समय पूरे 7 दिन तक आपस में भिड़े रहे थे।
उसी के अनुसार 7 दिन में 8 बार भोजन के अनुसार ये 56 भोग का सार बन गया है। तब से भगवान श्री कृष्ण को इस दिन 56 भोग का प्रसाद लगाया जाता हैं। ये भोग लगाने का भी हिन्दू धर्म में बहुत लाभ बताया गया।
गोवर्धन पूजा का सबसे अलग महत्व है। इस दिन 56 भोग का प्रसाद चढ़ाना बहुत शुभ और लाभदायी माना गया।
भक्तों के मन से भगवान की पूजा करने से भक्तों को चमत्कारी फल प्राप्त होता है और उनके सभी मन भी पूर्ण हो जाते हैं।
गुड़गांव की पूजा करना भी जरूरी है उसकी पूजा करना। श्रीमद्भगवद्गीता में गोवर्धन की पूजा के बारे में यह भी कहा गया है कि भगवान श्री कृष्ण ने सभी ब्रज के लोगों को गोवर्धन की पूजा करने के लिए कहा था।
सत्य है भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी इस पर्वत की आज भी यात्रा करते हैं। इसकी व्याख्या करने का यही अर्थ है कि राधा कृष्ण के दर्शन करना।

पूर्णिमा के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन लाखों भक्त गिरिराज जी अर्थात गोवर्धन की पूजा करते हैं। सिद्धांत है कि ऐसा करने से राधा कृष्ण की कैट की कृपा प्राप्त होती है।
यह मूल्यांकन 7 कोस यानी लगभग 21 किलोमीटर की है। जो भी इस परिक्रमा को पूर्ण करता है। उसे राधा कृष्ण का आशीर्वाद मिलता है और उसकी सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है।
जब बृज के लोग वर्षा प्राप्ति के लिए यज्ञ /हवन करते थे ताकि इंद्र देव उनसे प्रसन्न होकर उनकी वर्षा के जल की जरूरत को पूरा करे। ऐसा कई वर्षो से होता आ रहा परन्तु इस बार भगवान श्री कृष्ण जो की भगवान विष्णु के अवतार हैं।
उन्होंने ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत की महिमा बताते हुए इंद्र देव के बजाए गोवर्धन की पूजा करने के लिए प्रेरित किया और लोगों ने उनकी बात भी मान ली थी किन्तु इस वजह से इंद्र देव भगवान विष्णु के अवतार से बेखबर बृजवासी पर क्रोधित हो गए।
पुराणों में कहा गया है कि जब भगवान इंद्र ने श्री कृष्ण पर क्रोध के कारण बृज धाम में काफी मूसलाधार वर्षा की थी तब भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन को अपनी कनिष्ठा अंगुली से उठाया था जिसके नीचे सभी ब्रजवासियों के साथ – साथ वहां के पशुओं ने भी शरण ली थी।
इंद्र देव ने लगभग 7 दिनों तक भयंकर वर्षा की थी किन्तु गोवर्धन के नीचे सभी सुरक्षित थे। उसी दिन से गोवर्धन पर्वत के साथ ही गायों की भी पूजा की जाती है। इस दिन गायों की पूजा करना काफी शुभ माना गया है।
सनातन धर्म में गोवर्धन पूजा 2025 में बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार शामिल हैं। इस दिन सभी हिंदू धर्म के लोग गौ माता को नहलाते हैं और उनका पालन करते हैं और गौ माता की पूजा करते हैं।
यह पूजा देश के हर कोने में होती है। कई स्थानों पर इस पूजा को घर में सुख और समृद्धि के लिए भी किया जाता है। इस दिन श्री कृष्ण की पूजा की जाती है और उनके घर में सुख शांति की कामना की जाती है।
गोवर्धन पर्वत की कहानी से हमें काफी बातें सीखने को मिलती हैं जैसे कि उस समय श्री कृष्ण ने इंद्र देव के घमंड को तोड़ने के लिए ही ये पूरी लीला रची थी।
ये बिल्कुल सत्य बात है कि जल मनुष्य के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होता है लेकिन अपनी ताकत के प्रदर्शन के लिए किसी को भी बेकार व्यक्ति को परेशान करना गलत बात है।
इसलिए भगवान ने इंद्र देव का घमंड तोडा। इससे हमे दो बातें सीखनी चाहिए। पहली यही की कभी भी अपनी ताकत दिखाने के लिए किसी भी कमज़ोर मनुष्य को परेशान करना गलत है जैसा कि इंद्र देव ने किया था और दूसरी बात ये की हमेशा ही दुसरो की मदद के तैयार रहना चाहिए जैसे कि गोवर्धन पर्वत ने की।
हमने आपको इस लेख के माध्यम से गोवर्धन पूजा 2025 के संबंध में सारी जानकारी उपलब्ध करायी है।
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