Pandit for Shiv Mahapuran: Cost, Vidhi, & Benefits
क्या आप लोग नियमित रूप से शिव महापुराण पढ़ते हैं और इसके बारे में जानते हैं? यदि नहीं, तो हम आपको इसे सीखने में मार्गदर्शन करेंगे…
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राजस्थान के लोकदेवता - हमारे राजस्थान में विभिन्न प्रकार की परंपराएँ और विरासतें मौजूद हैं| राजस्थान के लगभग सभी ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों में अनेक लोक देवता, लोक देवियाँ एवं तीर्थों की बहुत मान्यता है|
इसके बारे में पौराणिक आख्यानों में तो किसी भी प्रकार का वर्णन नहीं किया गया है, जो कि उत्तर प्रदेश के आम ग्रामीण लोगों की श्रृद्धा और गहन आस्था के कारण पवित्र तीर्थस्थल के रूप में स्वीकार किया गया है।
इन्हें राजस्थान के लोक देवताओं के रूप में भी जाना जाता है| यह सभी पवित्र राजस्थान के लोकदेवता (राजस्थान के लोकदेवता) धाम कई प्राचीन काल से आम जन को शक्ति, स्वास्थ्य और खुशहाली प्रदान कर रहे हैं|
पाबू, हडबू, रामदे, मांगलिया महा |
पांचू पीर पधारज्यों, गोगाजी जेहा ||
उनकी अद्भुत शक्तियां और साहसिक कार्य करने वाले महापुरुष सामान्य जन में लोक देवताओं के नाम से प्रसिद्ध हुए| पौराणिक कथाओं के अनुसार लोकदेवता ऐसे महान पुरुषों को कहा जाता है|
समाज में हिंदू धर्म की रक्षा, नैतिक मूल्यों की स्थापना, समाज के सुधार और निष्कर्ष में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और सर्वस्व न्योछावर कर दिया|
इस कारण से स्थानीय लोगों ने इस महान पुरुषों को देवीय अंश के रूप में स्वीकार कर लिया और इसलिए लोकदेवता ने कहा जाने लगा|
राजस्थान के लोकदेवता (राजस्थान के लोकदेवता) अपने महान और मंगलकारी कार्यों के कारण लोगों की आस्था के प्रतीक बन गए| इसके विपरीत सामान्य सिद्धांत का मंगलकर्ता एवं देवो के समान उपयोगिता पूजा की जाने लगी|
माना जाता है राजस्थान के (Rajasthan Ke Lokdevta) लोकदेवता तथा लोक देवियाँ अपने समय के महान योद्धा थे| राजस्थान के लोकदेवता (Rajasthan Ke Lokdevta) आज के समय में भी प्रत्येक गाँव-गाँव में इनके थान, देवल, तथा चबूतरे आम लोगों की आस्था का केंद्र है|
जाति संबंधी भेदभाव एवं छुआछूत से दूर इन पवित्र स्थानों पर सभी लोग पूजा करने आते है| गाँवों में आम जन लोकदेवताओं की पूजा करते है, उनसे मन्नत मांगते है तथा मन्नत के पूरा होने पर रात्रि में इन स्थानों पर जागरण करवाया जाता है|
बता दें कि राजस्थान के मारवाड़ी क्षेत्र में प्रमुख पांच लोक देवता - गोगाजी, रामदेवजी, हड़बूजी, मेहाजी और पाबूजी को पंच पीर माना जाता है|
आज इस लेख के माध्यम से हम आपको राजस्थान के लोकदेवता (राजस्थान के लोकदेवता) एवं लोकदेवियों (लोकदेवियां) के बारे में बहुत महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करेंगे|
| देवनारायण जी | इलोजी | देव बाबा | हड़बूजी |
| तल्लीनाथ जी | हरिराम बाबा | मामा देव | पाबूजी |
| गोगाजी | गालव ऋषि | केसरिया कुँवर जी | वीर बिग्गाजी |
| वीरपनराजजी | भौमिया जी | राडा जी/रूपनाथ | डूंगर जी – जवाहर जी (काका-भतीजा) |
| वीर कल्ला जी राठौड़ | मल्लिनाथ जी | मेहाजी मांगलिया | बाबा जुन्ज़ार जी |
| तेजाजी | भूरिया बाबा/ गौतमेश्वर | रामदेव जी | वीर फत्ता जी |
राजस्थान के पंच पीरों में मेहाजी मांगलिया जी भी शामिल हैं| मेहाजी का जन्म 15वीं शताब्दी में क्षत्रिय क्षत्रिय परिवार में हुआ था|
यह राव चुण्डा के समकालीन थे| मेहाजी का पालन-पोषण उनके ननिहाल में मांगलिया गोत्र में हुआ था|इसी कारण से इनका नाम मेहाजी मांगलिया रखा गया|
आस्तिक के राव रंगदेव भाभी से युद्ध करते हुए महाजी मांगलिया जी की वीरगति की प्राप्ति हुई| बापणी में इनका मंदिर है जहां भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को मेला भरता है|
1358 ई. मारवाड़ के रावल सलखा एवं जाणीदे के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में मल्लीनाथ जी ने अपने पिता की मृत्यु के बाद यहां महेवा में शासन प्रबंधन की दृष्टि की|
इसके बाद आपके चाचा की मृत्यु के बाद 1374 ई. मल्लीनाथ जी महेवा के स्वामी बन गये| सन 1378 ई. फिरोज़ तुगलक के मालवा के सेंचुरीदार निज़ामुद्दीन की सेना में मल्लिनाथ जी ने परास्त किया था|
योग साधना की सहायता से इन्होने सिद्ध पुरुष की पहचान प्राप्त की| मल्लीनाथ जी ने 1399 ई. में मारवाड़ी क्षेत्र के सभी सन्तों को एकत्र किया। वृहत् हरि-कीर्तन का आयोजन में|
इसी वर्ष चैत्र शुक्ल की द्वितीय तिथि को स्वर्गवास हुआ था| तिल तिल हुआ (बाडमेर) लूनी नदी के तट पर मल्लीनाथ जी का मंदिर है|
यहां हर वर्ष चैत्र कृष्ण की तृतीया से चैत्र शुक्ल तृतीया तक एक बहुत ही विशाल पशु मेले का आयोजन होता है| मल्लीनाथ जी की आज भी मॅंगलानी (बाडमेर) में बहुत अधिक मान्यता है|
राजस्थान के लोक देवताओं (Rajasthan Ke Lokdevta) में शामिल वीर कल्ला जी का जन्म 1544 ई. राव जयमल राठौड़ के छोटे गांव मेड़ता के निकट सामियाना गांव में भाई आससिंह के घर हुआ था|
कल्ला जी अपनी बाल्यावस्था से ही अपनी कुलदेवी नागणेची माता की आराधना करने लगे थे| मीरा की बोली थी| उदाहरणार्थ अस्त्र-शास्त्र औषधि व औषधि विज्ञान में महानता प्राप्त थी|

जब 1562 ई. में अकबर में मेड़ता पर आक्रमण किया था, उसे समय कल्लाजी ने घायल जयमल को दोनों हाथों में तलवार देकर उन्हे अपने कंधे पर बैठा लिया तथा खुद भी दोनों हाथों में तलवार लेकर युद्ध करने लग गए| इन दोनों ने दुश्मन की सेना में तबाही मचा दी थी|
इसी कारण से कल्ला जी चार हाथ एवं दो सिर वाले देवता के रूप में प्रसिद्ध हैं| कल्ला जी को शेषनाग के रूप में भी जाना जाता है
वीर कल्ला जी के मारवाडा, बांसवाड़ा, मेवाड़ तथा मध्य प्रदेश में लगभग 500 मंदिर स्थित है| इन सभी मंदिरों के पुजारी सर्पदंश से पीड़ित लोगों का उपचार करते है|
हड़बूजी महाराज सांखला के पुत्र और राव जोधा के समकालीन थे| उनके पिता की मृत्यु के बाद हरभूजी ने भुंडौल को छोड़ दिया और हरभमजाल में रहना लग गया|
लोकदेवता स्वामीजी से प्रेरणा लेकर इन्होने अस्त्र-शास्त्र को त्याग दिया और अपने गुरु बालीनाथ जी से दीक्षा ली|
लोकदेवता हड़बूजी को शकुन शास्त्री, चमत्कारी एवं वचनसिद्ध पुरुष माना जाता है| लोकदेवता हड़बूजी जी पंच पीर भी शामिल हैं|
गौ रक्षक तथा गौ सेवक वीर बिगगाजी का जन्म 1301 ई. रोडी गांव में हुआ आवेदन| इनके पिता का नाम रावमहन और माता का नाम सुल्तानी था|
यह एक जाट परिवार से संबंध थे| बिगगाजी को परिधान से बहुत ही मुख्य शुरुआत थी| इस कारण इन्होने अपना संपूर्ण जीवन गौ सेवा में ही चुना|
1393 ई. मुस्लिम मुस्लिम से रक्षा करते हुए, वीरगति प्राप्त हुई| जाखड़ गौत्र वाले जाट वीर बिगगाजी को अपना कुलदेवता मानते हैं|
तल्लीनाथ जी का जन्म महाराज वीरमदेव जी का घर हुआ था| वीरमदेव जी शेरगढ़ के शासक थे| ऐसा माना जाता है कि तल्लीनाथ जी का नाम गंगादेव था|
संत दीक्षा के बाद इन्होनें गुरुदेव जालंधर राव जी से दीक्षा प्राप्त की| इन्होनें हमेशा ही पेड़-पौधों के चाहने वालों और रक्षा पर ज़ोर दिया| प्रकृति प्रेमी होने का कारण प्रकृति प्रेमी लोकदेवता भी कहा जाने लगा|

लोकदेवता तल्लीनाथ जी जालौर के सबसे प्रसिद्ध लोकदेवता हैं| जालौर के पांचोंटा गांव के निकट पंचमुखी पर्वत अपना स्थान रखता है, इस स्थान पर कोई भी पेड़-पौधे नहीं कटता है|
किसी भी जानवर या व्यक्ति के मच्छर के काटने या बीमार होने की तस्वीर तल्लीनाथ जी के नाम से बताई जाती है|
वीर फत्ता जी का जन्म सांथू गाँव में गज्जारणी परिवार में हुआ था| लुटेरों के गाँव की रक्षा करते हुए फत्ता जी का स्वर्गवास हो गया था| इनके जन्म स्थान सांथू गाँव में ही इनका मंदिर स्थित है| जहाँ पर प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल नवमी को मेला लगता है|
इनका जन्म नगा गाँव (जैसलमेर) में हुआ था| वीरपनराजजी क्षत्रिय परिवार से संबंध रखते है| वीरपनराजजी ने काठोडी गाँव, जैसलमेर में एक ब्राह्मण परिवार की गाय को मुस्लिम लुटेरों से बचाते हुए अपने प्राण त्याग दिए| जैसलमेर के पनराजसर नामक गाँव में इनका मुख्य मंदिर स्थित है|
राजस्थान के लोकदेवता (राजस्थान के लोकदेवता) श्री बाबा झंझार जी का जन्म इमलोहा नामक गाँव में हुआ जो कि सीकर में स्थित है| यह राजपूत परिवार से संबंध थे|
अपने शिष्य के साथ मुस्लिम मुस्लिम से गांव की रक्षा करते हुए वीरगति की प्राप्ति हुई| बाबा झुंझार जी का मुख्य मंदिर स्यालोदा में बना है| इस स्थान पर हर रामनवमी को होता है मेला|
राजस्थान के लोकदेवताओं में से एक मात्र ऐसा लोकदेवता है जिसमें मूर्ति, मिट्टी और पत्थर की लकड़ी से बड़ी विनिर्माण तकनीक बनाई गई है| किस गाँव के मुख्य मार्ग पर रखा जाता है|
मामादेव जी को पत्थर का देवता माना जाता है| बफ़ेलो की बलि दी जाती है | इनमें से एक प्रतीक के रूप में अश्वरूढ़ मृण्मूर्तियाँ हैं जो जालौर के हरजी गाँव की बहुत प्रसिद्ध हैं|
1857 की क्रांति के समय गालव ऋषि जी को राजस्थान के लोकदेवता (Rajasthan Ke Lokdevta) के रूप में पूजा जाता है| गालव ऋषि जी का मुख्य स्थान जयपुर में स्थित गलता जी को माना जाता है| इस प्राचीन तीर्थ स्थान को राजस्थान का बनारस कहा जाता है|
राजस्थान के लोकदेवता (राजस्थान के लोकदेवता) इलोजी को मारवाड़ क्षेत्र में मुर्गों के लोक देवता के रूप में जाना जाता है|
लोकदेवता इलोजी की पूजा करने से ब्रह्माओं को दुल्हन, नवदंपतियों को सुखद जीवन और बाँझ जादूगर को पुत्र की प्राप्ति होती है|
यह दोनों काका-भतीजा जिन्हें डूंगर जी तथा जवाहर जी के नाम से जाना जाता था, डाकू रूप में सीकर के लोकदेवता है| यह दोनों अमीर लोगों से धन चुराकर उन्हें गरीब लोगों में बाँट देते थे| इन्होने नसीराबाद की छावनी को लुटा था|
राजस्थान के लोकदेवता की सूची में शामिल रूपनाथ जी का जन्म कोलूमण्ड, जोधपुर में हुआ था| रूपनाथ जी पाबूजी के बड़े भाई बूढ़ों जी के बेटे थे| इन्होने जिद्राव ड्रेगली को अपने पिता और चाचा की हत्या का बदला लिया था|
हिमाचल प्रदेश राज्य में प्राचीन काल के बालकनाथ के रूप में पूजा की जाती है| इसका मुख्य मंदिर शिंभूडा गांव (नोखा मंडी, जिला) तथा कोलुमण्ड में भी स्थित है|
वीर तेजाजी का जन्म 1073 ई. माघ शुक्ल चतुर्दशी तिथि को नागौर के खरनाल गांव में नागवंशीय जाट कुल में हुआ था| इनके पिता जी का नाम ताहड़जी एवं माता का नाम रामकुँवरी था|
ऐसा माना जाता है कि जब तेजाजी महाराज महाराजा से रक्षा करने जा रहे थे तो उसी समय उनका एक सर्प मिला| उन्होंने सर्प को यह वचन दिया कि वह मुक्त होकर सागर के पास पुनः आ जाएगा|
उन्होंने बहुत ही संघर्ष के साथ मिलकर किसानों को मुक्त किया| इसके बाद वह अपनी घायल अवस्था में उसी समुद्र के पास पहुंच गई|
भाद्रपद शुक्ल दशमी को सर्प के काटने का कारण किशनगढ़ में तेजाजी की मृत्यु हो गई| उनका यह साहसिक कार्य, गौ रक्षा एवं वचन शिक्षा के कारण उन्हें देवत्व प्रदान किया गया
लोकदेवता देवनारायण जी का जन्म 1243 ई. के आस-पास हुआ था| देवनारायण जी के पिता का नाम भोजा एवं माता का नाम सेंदु गुजरी था| इनके बचपन का नाम उदयसिंह था|
लोकदेवता देवनारायण जी के पिता का निधन पूर्व जन्म से पूर्व भिनाय के शासक से संघर्ष में उनके सभी तैस श्रमिकों के साथ हुआ था|
इन्होनें ब्यावर में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने युद्ध करते समय अपना प्राण त्याग दिया| . गौ रक्षक लोकदेवता भी कहा जाता है|

स्वामी जी को समस्त लोकदेवताओं में से एक प्रमुख अवतारी पुरुष माना जाता है| तंवर वंश के अजमलजी एवं मनादे के पुत्र वजीर जी का जन्म मेरठ जिले के शिव तहसील में हुआ था|
कृप्या मल्लीनाथ जी को समकालीन माना जाता है| बाबाजी वीर होने के साथ ही समाज-सुधारक भी थे| रेवेन्यू जी के द्वारा ही कामरेड़िया पंथ की स्थापना हुई थी|
राजस्थान के लोक साहित्य में बताया गया है कि पाजी लक्ष्मण जी के अवतार थे| मेहर जातिके मुस्लिम उदाहरण पीर मांगल पूजा करते हैं| इसके साथ ही पाबूजी को कुण्डलों का देवता भी कहा जाता है|
मारवाड़ी इलाके में घोड़े की पूरी श्रेया बूजी को दिया जाता है| पाबूजी का जन्म 1239 ई. मे राव आस्थान जी के पुत्र धांधलजी के घर हुआ था|
राजस्थान के पंच पीरों में पहला नाम गोगाजी का ही लिया जाता है| गोगाजी की सर्पों की देवता के रूप में भी पूजा की जाती है|
यह हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों में ही लोकप्रिय थे| गोगाजी का जन्म 1003 ई. राजस्थान के चुरू जिले के दादरेवा में हुआ था|
इनके पिता का नाम राजा जेवर एवं माता रानी बाछल थी| यह नागवंशीय कुल से थे| बाछल ने 12 वर्षों तक गुरु गोरखनाथ जी की पूजा की, जिसके पश्चात गोगाजी का जन्म हुआ|
| माता-पिता | प्रमुख स्थल | विशिष्टता: |
| दधिमती माता | गौठ मांगलोद (नागौर) | दधिमती माता दाधीच ब्राह्मणों की कुलदेवी है| इस मंदिर के गुम्बद पर सम्पूर्ण रामायण उकेरी हुई है| |
| ब्राह्मणी माता | सोरसेन (बारां) | विश्व की एकमात्र ऐसी देवी जिनकी पीठ का श्रृंगार व पूजा की जाती है| माघ शुक्ल सप्तमी को यहां मेला लगता है| |
| छींक माता | रायपुर | राजस्थान में कई स्थानों पर विवाह के समय छींक का अपशगुन दूर करने के लिए छींक का डोरा बांधा जाता है| |
| भंवाल माता | भंवाल (नागौर) | इन्हे ढाई प्याली शराब चढ़ाई जाती है| |
| भदाणा माता | भदाणा (कोटा) | यहाँ मूठ से पीड़ित व्यक्तियों का उपचार किया जाता है| |
| सुंधा माता | भीनमाल (जालौर) | यहाँ रोप-वे स्थापित है| यहाँ भालू अभ्यारण भी स्थित है| |
| लटियाल माता | फलौदी (जोधपुर) | यह कल्ला ब्राह्मणों की कुलदेवी है| इनका अन्य नाम ‘खेजड़ बेरी राय भवानी’ भी है| |
| आवड़ माता | ||
| सुराणा माता | गोरखाण (नागौर) | इन्होने जीवित समाधि ली थी| |
| आमजा माता | रीछड़ा (राजसमंद) | भील जाति के लोग इनकी पूजा करते है| |
| बड़ली माता | आकोला (चित्तौड़) | माना जाता है इस मंदिर को 2 तिबारियों से बच्चे निकलने पर असाध्य रोग सही हो जाते है| यह मंदिर बेडच नदी के किनारे स्थित है| |
| राजेश्वरी माता | जूनानू | यह भरतपुर के जाट राजवंश की कुलदेवी है| |
| महामाया | मावली (उदयपुर) | इन्हें शिशु रक्षक देवी के रूप में भी पूजा जाता है| |
| आवरी माता | निकुम्भ (चित्तौड़गढ़) | इन माता के मंदिर में लकवाग्रस्त रोगियों का उपचार किया जाता है| |
| मरकंडी माता | निमाज (पाली) | इस मंदिर का निर्माण गुर्जर वंश के राजा ने 9वी शताब्दी में करवाया था| |
| ज्वाला माता | जोबनेर (जयपुर) | यह एक शक्तिपीठ है, यहाँ माता का घुटना गिरा था| खंगारोतों की ईष्ट देवी| |
| क्षेमकारी माता | भीनमाल (जालौर) | क्षेमकारी माता को स्थानीय भाषा में क्षेमज, खीमज आदि नामों से जाना जाता है| |
| अधर देवी | माउंट आबू (सिरोही) | यह माता 51 शक्तिपीठों में शामिल है| माना जाता है कि इस स्थान पर माता पार्वती के होंठ गिरे थे| इनकी पूजा देवी दुर्गा के छठे रूप देवी कात्यायनी के रूप में की जाती है| |
| घेवर माता | राजसमंद | घेवर माता अपने हाथों में होम की अग्नि प्रज्वलित करके अकेली सती हुई थी| |
| कंठेसरी माता | यह आदिवासियों की कुलदेवी है| | |
| वांकल माता | वीरातरा (बाड़मेर) | यह नन्दवाणा ब्राह्मणों की कुलदेवी के रूप में जानी जाती है| वांकल देवी के पुजारी पंवार राजपूत होते है| |
| नगदी माता | जय भवानीपुरा (जयपुर) | |
| कालिका माता | चित्तौड़गढ़ दुर्ग | यह गहलोत वंश की कुलदेवी है| इस मंदिर में कई स्थानों पर सूर्य की प्रतिमा बनी हुई है| |
| हर्षद माता | आभानेरी (दौसा) | आभानेरी में चाँद बावड़ी बनी हुई है| |
| बीजासन माता | इंद्रगढ़ (बूंदी) | इन्हें पुत्र दायिनी एवं सौभाग्य प्रदान करने वाली देवी के रूप में भी पूजा जाता है| महाराज शिवाजी राव होलकर ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था| |
| बदनौर की कुशला माता | भीलवाड़ा | |
| खोरड़ी माता | करौली |
राजस्थान के लोगों की राजस्थान के लोकदेवता के प्रति बहुत गहरी आस्था है| इन सभी लोगों को अपने साहसिक कार्य और अपने धर्म के प्रति दिए गए बलिदान के कारण ही राजस्थान के लोकदेवता की डिग्री दी गई है|
एक ही प्रकार की राजस्थान की लोक देवियाँ हैं| राजस्थान के लोग इन लोकदेववादियों एवं लोकदेवियों की पूर्ण श्रद्धा से पूजा करते हैं|
इस लेख में हमने राजस्थान के लोकदेवताओं के जन्म से संबंधित प्रत्येक जानकारी आपको प्रदान करने की कोशिश की है
साथ ही राजस्थान की लोकदेवियाँ (राजस्थान की लोक देवियाँ) के प्रमुख मंदिर तथा उनकी विशेषता के बारे में भी बताया है|
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