श्रावण पूर्णिमा 2026: तिथि, समय, पूजा विधि और महत्व
श्रावण पूर्णिमा 2026 शुक्रवार, 28 अगस्त, 2026 को पड़ रही है। यह पूर्णिमा का दिन है जो…
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आज हम बात करने वाले हैं हिंदू धर्म के सबसे प्रमुख त्योहारों में से एक रक्षा बंधन 2026 के बारे में, जिसमें होली, आदि जैसे त्योहारों को बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है।
वर्ष 2026 में, पूर्णिमा की तिथि 27 मार्च 2026 को सुबह 08:16 बजे से शुरू हुआ 28 मार्च 2026 को सुबह 05:51 अपराह्न तक रहेंगे। इस प्रकार, रक्षा बंधन का पर्व 28 मार्च 2026 मनाया गया।
हिंदू धर्म के लोगों के लिए उनके सभी त्योहार काफी महत्वपूर्ण हैं। वे अपने त्योहारों को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं।

हिंदू धर्म में सभी त्योहारों के लिए अलग-अलग मान्यताएं और उनका एक अलग ही काम छिपा होता है।
पंचांग के अनुसार, रक्षा बंधन का यह पावन पर्व जिसको राखी के नाम से भी जाना जाता है। इसे सावन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।
वैसे तो भारत देश में बहुत से त्योहार हैं लेकिन रक्षा बंधन आपके लिए सबसे बड़ा महत्व है। इस दिन कारीगरों को राखी बांधती है और उनकी लंबी उम्र और भविष्य की कामना करती है।
भाई भी अपनी बहन को रक्षासूत्र की आपूर्ति हमेशा के लिए रक्षा करने का वचन देता है। पूरे विश्व में केवल यही एक ऐसा त्यौहार है जो मनाया जाता है तो केवल एक दिन मनाया जाता है लेकिन बनने वाले वाले यह उत्सव हमेशा के लिए ही बना रहता है।
आज हम इस आर्टिकल के माध्यम से आपको इस पर्व से संबंधित सारी जानकारी प्रदान करेंगे। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार रक्षा बंधन को भद्रा रहित ही मनाना चाहिए क्योंकि भद्राकाल में मांगलिक और धार्मिक कार्य को करना बहुत अशुभ माना जाता है।
वर्ष 2026 में रक्षा बंधन का पर्व 28 अगस्त को मनाया जाएगा। शुभ मूर्ति और समय की विस्तृत जानकारी नीचे दी गई है:
| विवरण | समय और तिथि |
| रक्षा बंधन 2026 दिनांक | 28 अगस्त 2026 (गुरुवार) |
| रक्षा बंधन अनुष्ठान समय | प्रातः 05:51 बजे से सायं 06:15 बजे तक |
| पूर्णिमा तिथि प्रारंभ | 27 अगस्त 2026 को प्रातः 08:16 बजे से |
| पूर्णिमा तिथि समाप्त | 28 अगस्त 2026 को प्रातः 05:51 बजे तक |
विशेष नोट: वर्ष 2026 में रक्षा बंधन के दिन भद्रा का साया नहीं रहेगा, क्योंकि भद्रा पूर्णिमा तिथि के साथ शुरू होकर 27 अगस्त की रात को ही समाप्त हो जाएगी। इसलिए, 28 अगस्त को पूरे दिन राखी बांधना शुभ रहेगा।
हिन्दू धर्म में रक्षा बंधन का यह त्यौहार काफी महत्व रखता है। यह हिंदुओं का महत्वपूर्ण पर्व है। दुनिया के हर कोने में जहाँ – जहाँ पर हिन्दू धर्म के लोग रहते है।
वहां यह पर्व मजदूरों और आदिवासियों के बीच मनाया जाता है। इस पर्व का आध्यात्मिक महत्व के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्व भी काफी अधिक है।
अब अगर हम बात करते है की यह त्यौहार मनाया क्यों जाता है तो इसका केवल एक जवाब दे पाना काफी कठिन से है क्योंकि इसके संदर्भ में काफी सारी लोककथाए है जिसके बारे में आज हम इस आर्टिकल के माध्यम से जानेंगे।
रक्षा बंधन को स्थापित करने के सन्दर्भ में कई लोक कथाएँ प्रचलित हैं जिन्हें जानना आपके लिए भी आवश्यक है।
वेदों के अनुसार दैत्यराज बलि ने स्वर्ग को पाने की इच्छा से घनघोर तपस्या और यज्ञ किया। भय के कारण सभी देवताओ ने राजा बलि को रोकने के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और राजा बलि के पास भिक्षा मांगने गये।
राजा बलि बड़े दानी पुरुष थे। भगवान विष्णु ने राजा बलि से 3 पग धरती पर भिक्षा ली। भगवान ने एक पग स्वर्ग में और एक पग धरती पर नाप लिया और तीसरा पग रखने की जगह नहीं बेची। तब राजा बलि चिंता में आ गए और उन्होंने भगवान को अपना तीसरा पग स्वयं के सिर पर रखने को कहा।

जब भगवान वामन ने राजा बलि के सिर पर अपना पैर रखा तो राजा बलि सुतल लोक में पहुंच गए। राजा बलि की दानवीरता से प्रसन्न होकर उन्हें सुतल लोक ने राज्य दे दिया और एक वैभवशाली सम्राट को कहा तब राजा बलि ने भगवान को द्वारपाल के रूप में अपने साथ रहने को कहा। इससे माता लक्ष्मी भी काफी चिंतित हो गईं।
तब देवर्षि नारद जी ने उन्हें राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधने को कहा था। जब मां लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधा और जब राजा बलि ने मां लक्ष्मी से उपहार मांगा तो कहा कि तब लक्ष्मी मां ने भगवान विष्णु से मांग ली। जिससे मां लक्ष्मी अपने पति से मिल गईं।
पुराणों के अनुसार जब दैत्यों और देवताओं के मध्य युद्ध हुआ था। तब इंद्र देव की पत्नी सची ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी ताकि इंद्र देव पराजित ना हो। तब भगवान विष्णु ने हाथ में पहने जाने वाला सूती के धागे का वलय बनाया और सची को दे दिया।
फिर सची ने यह वलय इंद्र देव के हाथ में बांध दिया जिससे वह बलि नाम के असुर को हराकर सफल हो गई। तब यह प्राथमिक केवल भाई-बहन तक ही सीमित नहीं रही। अब जब भी कोई पति युद्ध के लिए गया था तो उसकी पत्नी उसके हाथ पर ये बांधती थी।
भगवान गणेश जी के दो पुत्र थे शुभ और लाभ। जब उनके पिता रक्षा सूत्र बंधवाते थे तो उन्हें भी रक्षा बंधन की बहुत इच्छा थी। तब दोनों कारीगरों ने भगवान गणेश से बहन की मांग की।
इस पर गणेश जी सहमत हुए तथा उनकी दोनों पत्नियां रिद्धि और सिद्धि की आत्मशक्ति से एक कन्या का जन्म हुआ। जिनका नाम संतोषी रखा गया। इसके पश्चात शुभ और लाभ अपनी बहन के साथ रक्षा बंधन (आधा-छला) मना सके।
पुराणों के अनुसार जब भगवान श्री कृष्ण ने बालपाल का वध किया था तब सुदर्शन चक्र से श्री कृष्ण की अंगुली कट गई थी। तब उस समय द्रौपदी ने अपना आँचल रथकर कृष्ण भगवान की अँगुली पर छोड़ दिया था।
उसी समय भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी को वचन दिया था की जब भी उन्हें कोई भी कठिनाई आएगी तब मैं अवश्य तुम्हारी सहायता करूंगा। द्रौपदी के चीर हरण के समय श्री कृष्ण ने यही वादा निभाया था।
यह कथा काफी पुरानी है। इसका कोई प्रमाण उपस्थित नहीं है किन्तु कुछ इतिहासकारों मानना यह है कि जब चित्तोड़ की रानी को लगा कि उनका राज्य बहादुरशाह जफ़र से बचाया नहीं जा है। तब रानी ने हुमायूँ को जो कि चित्तोड़ का सबसे बड़ा दुश्मन को राखी भेजकर उनसे मदद मांगी थी।
यह इतिहास की काफी पुरानी घटना है जब सिकंदर भारत आया था तब सिकंदर की पत्नी ने राजा पोरस को राखी भेजी और उनसे वचन लिया कि वे युद्ध के दौरान सिकंदर पर जानलेवा हमला नहीं करेंगे।
युद्ध के दौरान जब राजा पोरस ने अपने हाथ में बंधी राखी देखी इसलिए उन्होंने सिकंदर पर जानलेवा हमला नहीं लिया क्यूंकि राजा पोरस उस समय के सबसे कुशल योद्धा रहे है।
18 वी शताब्दी के महाराजा रणजीत सिंह, जिन्होंने सिक्ख समाज की स्थापना की थी, की पत्नी ने नेपाल के राजा को राखी भिजवाई थी। नेपाल के राजा ने उनकी राखी तो स्वीकार कर ली लेकिन नेपाल के हिन्दू राज्य देने से साफ़ मना कर दिया।
आज के समय में त्योहारों के लिए केवल पैसे का इंतजाम करके रखा गया है। इस त्यौहार को अलविदा कहने से पहले लोगों को नारियों की इज्जत देनी चाहिए। इस त्यौहार को बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक और पारंपरिक तरीके से मनाया जाना चाहिए।
हमारे त्यौहार का आज के समय में कुछ खास महत्व नहीं बताया जा रहा है। लोगो के त्योहारों को लेकर पहले जो उत्साह था वो अब बिल्कुल ख़त्म हो चुका है। आज के युवाओं को फिर से अपने त्योहारों में खेती बढ़ाने के लिए हमें खुद ही प्रयास करना होगा।
रक्षा बंधन पर्व का मतलब रक्षा शब्द से ही है। जो भी आपकी रक्षा करने वाले है जरुरी नहीं की वो आपका भाई हो, वो कोई भी हो सकता है और आप उसे रक्षासूत्र बाँध सकते है।

श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध के पूर्व युधिष्ठिर से रक्षा सूत्र के बारे में कहा था कि उन्हें अपनी पूरी सेना के साथ रक्षा बंधन 2026 का त्यौहार मनाये जिससे उनकी सेना की रक्षा हो सके। श्री कृष्ण ने रक्षा सूत्र में अद्भुत शक्ति बताई है।
इस दिन बहनें प्रात काल: शीघ्र स्नान स्नान आदि से निवृत्त बार पूजा थाली में नारियल, चावल, राखी, दीपक, मिठाई और कुछ पैसे भी दिए जाते हैं। उसके बाद सबसे पहले अपने इष्ट देवता की पूजा करें।
उसके बाद कुमकुम से भाई के तिलक निकाल कर सिर पर अक्षत छिडके जाते है। भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बाँधी जाती थी।
पौराणिक कथाओं को भाई के सिर से उद्घाटित करते हुए गरीब लोगों में ज्योति की परंपरा है। बाकि त्यौहार की भांति ही उपहार और भोजन इस पर्व में भी विशेष महत्व रखती है।
इस दिन जिसको भी पूजा करनी होती है उसे जल्दी उठकर स्नान करके अपने इष्ट देवता की पूजा करके ही भोजन करना चाहिए। पूजा के लिए रंगीन सूत के डोरे का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
पूजा करते समय पूरा ध्यान पूजा में ही होना आवश्यक होता है। इसके पश्चात भाई के कुमकुम का तिलक लगाकर अक्षत का उपयोग करना चाहिए। राखी को भाई के दाहिने हाथ पर ही बांधा जाना चाहिए।
पौराणिक कथाओं के अनुसार रक्षा बंधन का हिन्दू धर्म में काफी महत्व है। राखी के पर्व की शुरुआत माँ लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बाँध कर की थी।
उसके बाद यही महाभारत में हुआ जब द्रौपदी को सहायता की जरूरत थी तब श्री कृष्ण ने द्रौपदी को दिया हुआ वादा निभाया जब द्रौपदी का चीर हरण हो रहा तब श्री कृष्ण ने उनकी सहायता की थी।
भरी सभा में द्रौपदी की लाज बचाने पर द्रौपदी ने श्री कृष्ण को राखी बांधी। तब से यह त्यौहार मनाया जा रहा है।
तो आज हमने आपको रक्षा बंधन से जुड़ी हुई सारी जानकारी उपलब्ध करवा दी है। इसके अलावा हमने आपको रक्षा बंधन 2026 के शुभ मुहूर्त के बारे में भी जानकारी ली गयी है और इस दिन आपको क्या – क्या करना चाहिए और क्या – क्या नहीं करना चाहिए हमने आपको इस बारे में भी बताया है।
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