शिव कैलाशो के वासी लिरिक्स इन हिंदी: शिव कैलाशो के वासी भजन
शिव कैलासो के वासी भजन हर शिवभक्त के दिल को सार्वभौम देता है। यह प्यारा गीत हमें भगवान शिव की…
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सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्रम गीत: सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्रम् माँ लक्ष्मी की यह विशेष और अत्यंत भव्य रूप की स्तुति-गान है, जिसे पढ़ने से जीवन में अशांति, चिंताएँ और आर्थिक कठिनाइयाँ धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं।
सिद्धि लक्ष्मी के स्वरूप हैं जो भक्त को केवल धन ही नहीं, बल्कि बुद्धि, शांति, साहस और परिश्रम में सिद्धि भी प्रदान करते हैं। यही कारण है कि सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्रम् को”सफलता वाला स्तोत्र" कहा जाता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा होती है और मन शांत रहता है।

कई लोग ऐसे होते हैं कि जब वे इसे रोज देखते हैं, तो उनका काम आसान हो जाता है और जीवन में एक नई स्थिरता आ जाती है। इसे पढ़ने में अन्य भी नहीं होते शब्द सरल होते हैं, और अर्थ मन को सीधे स्पर्श करते हैं।
सुबह की पूजा का समय या किसी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्रम गीत का पाठ करने से दिन शुभ, शांत और सफल माना जाता है।
कुल मिलाकर, यह स्तोत्र हर उस व्यक्ति के लिए उपयोगी है जो अपने जीवन में समृद्धि, स्थिरता और समृद्धि प्राप्त करता है माँ लक्ष्मी का दिव्य आशीर्वाद चाहता हूँ।
श्री सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्रम् का अर्थ माँ लक्ष्मी के उन दिव्य सिद्धांतों को कहा जाता है जो भक्त हैं शक्ति, शांति और सिद्धि प्रदान करते हैं।
इस स्तोत्र में देवी को आनंद देने वाली, क्लेश दूर करने वाली, दैत्य-नाशिनी और बुढ़ापे के रूप में बताया गया है। हर पंक्ति मन को शुद्ध करने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा संवर्धन का संदेश देता है।
यह महत्वपूर्ण बात तो यह है कि यह स्तोत्र का नियमित पाठ जीवन से है दुख, भय और दरिद्रता को दूर करना है.
यह व्यक्ति के अंदर स्थिरता, व्यक्तित्व और आध्यात्मिक शक्ति का जन्म होता है। कहा जाता है कि मां लक्ष्मी का यह स्तोत्र घर में शुभ वातावरण बनाता है और बाधाओं को शांत करता है।
जो व्यक्ति मन, घर और जीवन में समृद्धि और शांति चाहता है, उसके लिए यह स्तोत्र अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। इसका पाठ भक्त को मानसिक, आध्यात्मिक और भौतिक तीनो स्तर पर ऊपर उठाता है।
ॐ अस्य श्री सिद्धलक्ष्मीस्तोत्रमन्त्रस्य हिरण्यगर्भऋषिः अनुष्टुपचन्द्रः
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः श्रीं बीजं ह्रीं शक्तिः क्लीं
कीलकं मम सर्वक्लेशपीड़ापरिहारार्थं सर्वदुःखदारिद्र्यनाशनार्थं सर्वकार्यसिद्ध्यर्थं
च श्रीसिद्धलक्ष्मीस्तोत्रपथे विनियोगः।।
ॐ हिरण्यगर्भ ऋषये नमः शिरसि।।
अनुष्टुपच्छन्दसे नमो मुखे।।
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वती देवताभ्यो नमो हृदि।।
श्रीं बीजाय नमो गुहये।।
ह्रीं शक्तये नमः पादयोः।।
क्लीं कीलकाय नमो नाभौ।
विनियोगाय नमः सर्वांगेषु।
ॐ श्रीं सिद्धलक्ष्म्यै अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ ह्रीं विष्णुतेजसे महानिभ्यां नमः।
ॐ क्लीं अमृतानंदायै मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ श्रीं दैत्यमालिन्यै अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ ह्रीं तेजःप्रकाशिन्यै कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ क्लीं ब्रह्म्यै वैष्णवै रुद्राण्यै करतलकरप्रजाभ्यां नमः।
ॐ श्रीं सिद्धलक्ष्म्यै हृदयाय नमः।
ॐ ह्रीं विष्णुतेजसे शिरसे स्वाहा।
ॐ क्लीं अमृतानंदायै शिखायै वष्ट नमः।
ॐ श्रीं दैत्यमालिन्यै कवचय हुम्।
ॐ ह्रीं तेजःप्रकाशिन्यै उत्सवत्रयै वौषत्।
ॐ क्लीं ब्रह्म्यै वैष्णवै रुद्राण्यै अस्त्राय फट्।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं सिद्धलक्ष्म्यै नमः
तालत्रयं दिग्बंधनं च कुर्यात्।।
ब्राह्मणी च वैष्णवीं भद्रां षड्भुजां च चतुर्मुखीम्।
त्रिनेत्रां खड्ग त्रिशूल पद्मचक्र गदाधराम्।।
पीताम्बरधरां देवीं नानालाङ्कार भूषिताम्
तेजःपुंजधरिं देवीं ध्यायेद् बालकुमारिकाम्।।
ॐ कारं लक्ष्मीरूपं तु विष्णुं हृदयमव्ययम्।
विष्णुमानन्दमव्यक्तं ह्रींकारं बीजरूपिणीम्।। 1..
क्लीं अमृतानंदिनीं भद्रां सदात्यानंददायिनीम्
श्रीं दैत्यशमनीं शक्तिं मालिनीं शत्रुमर्दिनीम्।। 2..
तेजः प्रकाशिनीं देवीं वरदानं शुभकारिणीम्।
ब्राह्मणि च वैष्णवीं रौद्रीं कालिकारूपशोभिनीम्।। 3..
अकारे लक्ष्मीरूपं तु उकारे विष्णुमव्ययं।
मकारः पुरुषोऽव्यक्तो देवीप्रणव उच्यते।। 4..
सूर्यकोटि प्रतीकं चन्द्रकोटिसमप्रभां।
तन्मत्ये निकरं सूक्ष्मरं ब्रह्मरूपं सुरक्षाम्।। 5..
ॐकारं परमानन्दं सर्वदा सुखसुन्दरीं।
सिद्धलक्ष्मि मोक्षलक्ष्मि आद्यलक्ष्मि नमोऽस्तु ते।। 6 ..
सर्वमंगलमंगलये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तु ते।
प्रथमं त्र्यंबका गौरी द्वितीयं वैष्णवी तथा।
तृतीयं कमला प्रोक्ता चतुर्थं सुंदरी तथा।। 7 ..
पंचमं विष्णुशक्तिश्च षष्ठं कात्यायनी तथा।
वाराहि सप्तमं चैव ह्यष्टमं हरिवल्लभा।। 8 ..
नवमी खदिग्नि प्रोक्ता दशमं चैव देविका।
एकादशं सिद्धलक्ष्मीर्द्वादशं हंसवाहिनी।। 10..
एतत्स्तोत्रवरं देव्या ये पञ्ति सदा नाराः।
सर्वापद्भयो विमुच्यन्ते नात्र कार्या विचारा।। 11 ..
एकमासं द्वितीयसं च त्रिमासं मांचतुष्टयं।
पंचमासं च षण्मासं त्रिकालं यः सदा पठेत।। 12 ..
ब्राह्मणः क्लेशितो दुःखी दारिद्र्यामयपीडिटः।
जन्मान्तरसहस्त्रोत्थैरमुच्यते सर्वकिल्बिषाः।। 13।।
दरिद्रो लभते लक्ष्मीमपुत्रः पुत्रवान् भवेत्।
धन्यो यशस्वी शत्रुघ्नो वह्नीचैरभयेषु च।। 14।।
शाकिनि भूतवेताल सर्पव्याघ्र निपातने।
राजद्वारे सभास्थाने करागृह निबन्धने।। 15 ..
ईश्वरेण कृतं स्तोत्रं प्राणिनां हितकारकं।
स्तुवन्तु ब्राह्मण नित्यं दारिद्र्यं न च बाधते।
सर्वपापहरा लक्ष्मीः सर्वसिद्धिप्रदायिनी।। 16.
।।। इति श्रीब्रह्मपुराणे ईश्वरविष्णु संवंदे श्रीसिद्धलक्ष्मी स्तोत्रं संपूर्णं ।।।
इस विनियोग का अर्थ है कि श्री सिद्ध लक्ष्मी स्तोत्र के इस मंत्र के ऋषि हिरण्यगर्भ हैं, इसके छंद अनुष्टुप हैं, और इसकी देवियाँ महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती हैं। इसमें श्रीं बीज, ह्रीं शक्ति और क्लीं कीलक माना गया है।

इस स्तोत्र का पाठ मैं अपने सभी क्लेशों और कष्टों को दूर करने, सारे दुखों और दारिद्रों को समाप्त करने और अपने सभी कार्यों की सिद्धि प्राप्त करने के उद्देश्य से करता/करती हूं।
इस ऋष्यादि-न्यास में साधक सबसे पहले हिरण्यगर्भ ऋषि को सिर पर नमस्कार करता है, फिर अनुष्टुप छंद को मुख में स्थापित करता है।
इसके बाद महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवियों को हृदय से नमस्कार है। श्रीं बीज को गुह्य स्थान में, ह्रीं शक्ति को तीर्थों में, और क्लीं कीलक को नाभि में स्थापित किया जाता है।
अंत में आपके सभी क्लेश, पीड़ा, दुख और दारिद्रय को दूर करने और सभी कार्यों की सिद्धि प्राप्त करने के उद्देश्य से इस सिद्ध लक्ष्मी स्तोत्र के पाठ से पूरे शरीर को लाभ होता है।
इन कर-न्यास मंत्रों में साधक अपने दोनों हाथों में देवी की शक्तियों को स्थापित करता है, अंगूठों को सिद्ध लक्ष्मी को समर्पित करता है, समर्थकों में विष्णु के तेज का संकल्प करता है, मध्यमिका उँगलियों में अमृत और आनंद की शक्ति स्थापित करता है।
अनामिका में दैत्य-नाशिनी देवी की शक्ति को स्थापित किया जाता है, कनिष्ठा में तेज और प्रकाश की ऊर्जा को बरकरार रखा जाता है, और अंत में श्यामला हाथों के पृष्ठभाग में ब्राह्मी, वैष्णवी और रुद्राणी शक्तियों को नमस्कार करके पूर्ण सुरक्षा और दिव्य शक्ति का महत्व बताया जाता है।
षड्ग-न्यास मंत्रों का सार यह है कि साधक अपने शरीर के छह स्थानों पर देवी की शक्तियों को स्थापित करता है। इन मंत्रों के माध्यम से हृदय में सिद्ध लक्ष्मी का वास होता है, विष्णु के तेज को धारण किया जाता है।
अमृत और आनंद को शिखा में स्थापित किया जाता है, देवी की दैत्य-नाशिनी शक्ति को कवच के रूप में स्थापित किया जाता है, तेज और प्रकाश को तीर्थों में भरा जाता है, और अंत में ब्राह्मी-वैष्णवी-रुद्राणी शक्तियों को अस्त्र के रूप में स्थापित कर संपूर्ण सुरक्षा और शक्ति प्राप्त की जाती है।
"ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नमः" मंत्र के साधक द्वारा ताल-त्रय करते हुए दग्-बंधन (रक्षा स्थापित करना) किया जाता है।
अब ध्यान करें:
इसके बाद ध्यान में देवी को ब्राह्मी, वैष्णवी और भद्रा स्वरूप वाली, छह भुजाओं और चार मुखों से युक्त, तीन उत्सवों वाली, हाथों में खड्ग, त्रिशूल, पद्म, चक्र और गदा धारण करने वाली के रूप में देखा जाता है।
देवी पीताम्बर और धारण किए हुए, विभिन्न अलंकारों से सजी हुई, तेज से प्रकाशित, अत्यंत श्रेष्ठ बाल-कुमारी स्वरूप में ध्यान की रचनाएँ की जाती हैं।
इस स्तोत्र में कहा गया है कि 'ॐ' स्वरूप लक्ष्मी हैं, और विष्णु उनके हृदय हैं। विष्णु का स्वरूप आनंदमय और अव्यक्त है, जबकि "हीं" उनका बीज-रूप है।
"क्लीं" मंत्र वाली देवी अमृत जैसी आनंददायिनी, शुभ करने वाली और सत्य-आनंद प्रदान करने वाली हैं। वे देवताओं का नाश करने वाली, सभी शत्रुओं को शांत करने वाली और विनाश वाली शक्तिरूपा हैं।
देवी तेज को प्रकाशित करने वाली, अन्य प्रदान करने वाली, शुभ फल देने वाली, ब्राह्मी, वैष्णवी और रौद्री रूप वाली, और कालिका के रूप में अत्यंत शोभा देने वाली मणियाँ हैं।
इस स्तोत्र में बताया गया है कि 'अ' अक्षर लक्ष्मी का, 'उ' अक्षर विष्णु का और 'म' अक्षर अव्यक्त पुरुष का स्वरूप है, स्वर से मिलकर प्रणव (ॐ) देवी का ही रूप माना जाता है।
देवी का तेज सूर्य की करोड़ किरण जैसा और चंद्रमा की करोड़ किरण जैसा शांत प्रकाश उनके लिए है, जिसमें मध्य में अति सूक्ष्म ब्रह्मरूप स्थित है।
"ॐ" परम आनंद और सुखमयी सुंदरी लक्ष्मी को कहा गया है, सिद्ध लक्ष्मी, मोक्ष लक्ष्मी, आदि लक्ष्मी को नमस्कार है।
देवी को सर्व-मकारी, शिवा, सर्वकाम-सिद्धिदायिनी और त्र्यंबकंगा गौरी रूप में वंदन किया गया है। फिर देवी के बारह रूप बताए गए हैं, त्रंब्यका गौरी, वैष्णवी, कमला, सुंदरी, विष्णु-शक्ति, कात्यायनी, वाराही, हरिवल्लभा, खड्गिनी, रौद्र/वेवक, सिद्ध लक्ष्मी और हंसवाहिनी।
इस स्तोत्र में जो पुरुष या स्त्री नित्य पाठ करता है, वह सभी अपमानों और अत्याचारों से मुक्त होता है। एक महीना, दो महीना, तीन, चार, पांच या छह महीने तक प्रतिदिन तीसरी बार इसका पाठ करने से पूरी दूरी हो जाती है।
इस स्तोत्र में कहा गया है कि जो ब्राह्मण अत्याचारों, दुखों और दारिद्र्य से पीड़ित हो, वह इस स्तोत्र के प्रभाव से जन्म-जन्मांतर के पापों और दोषों से मुक्त हो जाता है।
दरिद्र व्यक्ति को लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, निःसंतान को संतान मिलती है, और मनुष्य को धन-यश से शत्रु शत्रुओं पर विजय मिलती है।
अग्नि, राक्षस, शत्रु, भूत-प्रेत, वेताल, सर्प और हिंसक जानवर इनमें से कुछ भी नहीं कर सकते। राज-द्वार, सभा या करागृह जैसे स्थान में भी वह दोष या बंधन से घिरा नहीं था।
यह स्तोत्र स्वयं ईश्वर द्वारा प्रकट हुआ, सभी संप्रदायों के कल्याण का साधन है जो ब्राह्मण नित्य स्तुति करते हैं, उन्हें दारिद्र्य नहीं सताता। लक्ष्मी जी ने सभी पापों को हरने वाली और सभी सिद्धियाँ देने वाली बात कही।
1. मानसिक शांति और स्थिरता:
इस स्तोत्र का नियमित पाठ मन को शांत करता है। जब आप इसे श्रद्धा और भक्ति के साथ कहते हैं, तो चिंता, भय और तनाव कम हो जाते हैं। मन स्थिर होता है और निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होती है।

2. घर और बाज़ार में सकारात्मकता:
स्तोत्र के मंत्र ऊर्जा घर और इरादों में नकारात्मकता को दूर करते हैं। इससे पर्यावरण शुद्ध और सुखमय बनता है।
3. आर्थिक लाभ और समृद्धि:
ऐसा माना जाता है कि लक्ष्मी की कृपा से धन-संपदा और आर्थिक समस्याएं कम होती हैं। दरिद्रता और औषधियों की कमी धीरे-धीरे दूर होती जा रही है।
4. सौभाग्य और सफलता:
यह स्तोत्र जीवन में आने वाली वस्तुओं और बाधाओं को कम करता है। कार्य में सफलता मिलती है और नए अवसर खुलते हैं।
5. हथियार और ऊर्जा:
पाठ करने से प्रमुखता है, मानसिक शक्ति और ऊर्जा संबद्धता है। व्यक्ति स्वयं को मजबूत और सकारात्मक महसूस कराता है।
6. आध्यात्मिक लाभ:
यह स्तोत्र भक्त को ईश्वर और देवी के साथ जोड़ता है। पढ़ने से आध्यात्म में स्थिरता आती है।
7. सुरक्षा और रक्षक शक्ति:
देवी की ऊर्जा साधक की रक्षा करती है। पाठ करने से घर और व्यक्ति दोनों नकारात्मक शक्तियां और बच्चे सुरक्षित रहते हैं।
8. भाग्य और मंगलमय जीवन:
नियमित पाठ्य से जीवन के सभी बुनियादी पहलू शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और आध्यात्मिक स्तर पर होते हैं। सुख, समृद्धि और मंगल की प्राप्ति होती है।
सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्रम् केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता लाने वाला दिव्य साधन है। इसका नियमित पाठ मानसिक शांति, हथियार और सकारात्मक ऊर्जा देता है।
जो भक्त इसे श्रद्धा और भक्ति भाव से देखते हैं, उनके जीवन में न केवल आर्थिक समस्याएं कम होती हैं, बल्कि घर में सुख-शांति और मंगलमय वातावरण भी बनता है।
सही उच्चारण, ध्यान और नियमित पाठ्यचर्या से माँ सिद्धि लक्ष्मी की कृपा स्थायी रूप से साधक पर बना रहता है। यह स्तोत्र जीवन के सभी आध्यात्मिक, आर्थिक और आध्यात्मिक पर आधारित है।
काम में सफलता चाहिए, घर में सुख चाहिए या जीवन में बाधाएं दूर होनी चाहिए, यह स्तोत्र हर स्थिति में सहायक माना गया है।
इसलिए, जो लोग अपने जीवन में स्थिरता, समृद्धि और दिव्य आशीर्वाद चाहते हैं, उनके लिए लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ अत्यंत और फलदायक होता है। यह नियमित रूप से जीवन को सुखी, सफल और मंगलमय बनाता है।
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