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Jaya Ekadashi Vrat Katha: जया एकादशी व्रत कथा

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Last Updated:ဖေဖေါ်ဝါရီလ 7, 2024
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ဂျာယာ အက်ကာဒီရှီ ဗာရတ် ကသာ: जया एकादशी का हिन्दू धर्म में बहुत महत्व माना जाता है| प्रत्येक वर्ष समस्त हिन्दू समुदाय के लोगों द्वारा जया एकादशी का व्रत किया जाता है| जया एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की पूर्ण विधिवत पूजा का विधान है| इस जया एकादशी तिथि के दिन व्रत करने तथा जया एकादशी व्रत कथा (ဂျာယာ အက်ကာဒီရှီ ဗာရတ် ကသာ) को पढने या सुनने से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है|

जया एकादशी व्रत कथा

जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) को सुनने का ही महत्व बताया गया है| इस एकादशी के दिन व्रत रखने के साथ-साथ जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) का पाठ होत करना भी बहु है| पद्म पुराण के अनुसार माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिषाठिर्र को इस कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) की महिमा के बारे में बताया था| तो आइये जानते है क्या बताया गया है जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) में|

इसके अलावा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे सरस्वती पूजा (သူရဿတီပူဂျာ), गृह प्रवेश पूजा (ဂရဟ ပရာဗက် ပူဂျာ), तथा विवाह पूजा (Marriage Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसान है|यहाँ बुकिंग प्रक्रिया बहुत ही आसान है| बस आपको “Pandit အွန်လိုင်းတွင် ကြိုတင်စာရင်းသွင်းပါ။” विकल्प का चुनाव करना होगा और अपनी सामान्य जानकारी जैसे कि अपना नाम, मेल, पूजा स्थान, समायायर चूजा से आप अपना पंडित बुक कर सकेंगे|

जया एकादशी व्रत कथा का महत्व – Jaya Ekadashi Vrat Katha ၏ အရေးပါမှု

युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से बोले कि – भगवन ! आपने मुझसे माघ महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी जिसे षटतालिका एकादेशनी जाता है, का बहुत ही अच्छे व सरल रूप वर्णन किया है| हे प्रभु आप स्वदेज, जरायुज चारों प्रकारों के जीवों को उत्पन्न, पालन तथा नाश करने वाले उत्पन्न| अब मैं आपसे विनती करता हूँ कि माघ शुक्ल एकादशी के बारे में मुझे कुछ जानकारी प्रद| इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसका व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है| सब विधिपूर्वक बतलाए|

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इस पर भगवान श्री कृष्ण कहते है कि – हे राजन ! माघ शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को जया एकादशी के नाम से जाना जाता है| इस व्रत को करने से जातक ब्रह्म हत्यादि के पापों को से मुक्त हो जाता है तथा इसके प्रभाव सोे जीव भूद, से मुक्त हो जाता है| जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) को सुनने का ही बहुत बड़ा महत्व बताया गया है| जया एकादशी व्रत को विधिपूर्वक करना जातक के लिए बहुत लाभकारी होता है| जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) का वर्णन पद्म पुराण में दिया गया है|

जया एकादशी व्रत कथा – Jaya Ekadashi Vrat Katha

एक समय की बात है कि देवराज इंद्र देव स्वर्ग में राज करते थे तथा अन्य सभी देवतागण भी सुख्ूर्य सभी करते थे| ϟ उन गन्धर्वों में सबसे प्रसिद्ध पुष्पदंत तथा उनकी कन्या पुष्पवती और चित्रसेन तथा उसक्भी धर उपस्थित थे| साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान तथा उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे|

पुष्पवती गन्धर्व कन्या माल्यवान को और देखें पुष्पवती ने अपने रूप, हावभाव से माल्यवान को अपने वश में कर लिया| वह पुष्पवती बहुत ही सुन्दर थी| इसके पश्चात वे इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए अपना गान शुरू करते है किन्तु एोहक-दुसरे ित से उनका ध्यान भटक गया| इनके इस प्रकार से भ्रमित होने से इंद्र देव को इनमे प्रेम के बारे में ज्ञात हो गया| उन्होंने इस गलती को अपनी बेज्ज़ती माना तथा उन दोनों को श्राप दे दिया कि वह स्त्री-ोतुरमकुष श्राप दे दिया कि वह स्त्री-ोम्रमकुष एले श्राप जाकर पिशाच रूप धारण करके अपने कर्मों के फल को भोगे|

जया एकादशी व्रत कथा

इंद्र देव के इस भयानक श्राप के कारण के वे दोनों अत्यंत ही दुखी हुए| इसके पश्चात वह दोनों हिमालय पर्वत पर ही अपना जीवन व्यतीत करने लगे| उन्हें गंध၊रस तथा स्पर्श के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं था| जिस वजह से उन्हें हिमालय पर्वत पर रहने में बहुत ही कठिनाई होती थी| कभी- कभी तो वह निंद्रा भी नहीं ले पाते थे| उस स्थान पर अत्यंत ही शीत था| जिस वजह से उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता था| शीत के कारण उनके दांत बजते थे| एक दिन पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा कि हमने पीछे जन्म क्या बुरे कर्म किये है| जिस कारण से हमे इतना कष्ट सहना पड़ रहा है|

इस दुःख से तो नरक की पीड़ा सहना ही उत्तम है| इसलिए हमे अब किसी भी प्रकार का कोई पाप नहीं करना चाहिए| ऐसे ही विचार करते-करते वह अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे| कुछ समय के पश्चात माघ माह के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी तिथि आ गई| इस दिन उन दोनों ने भोजन नहीं किया एवं पुरे दिन केवल अच्छे-अच्छे कार्य ही किये| इस दिन उन्होंने केवल फल-फूल खाकर ही अपना गुज़ारा किया| शाम के समय दोनों दुखी स्थिति में पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए| उस दिन बहुत ही अधिक ठंड थी, जिस कारण से वह दोनों मृतक के समान ही एक-दुसरे से लिपटे रहे| उस रात्रि को भी उन्हें नींद नहीं आई|

जया एकादशी का व्रत करने के अगले ही उन दोनों को पिशाच योनि से छुटकारा मिल गया| इसके पश्चात वह दोनों अपनी पूर्ण वेशभूषा में स्वर्ग लोक की ओर प्रस्थान कर गए| मार्ग में देवतागणों ने उनका पुष्पवर्षा से स्वागत किया| स्वर्ग लोक में पधारते ही उन्होंने सर्वप्रथम देवराज इंद्र को प्रणाम किया| उन दोनों पुनः अपने रूप में कर इंद्र देव आश्चर्यचकित हो गए तथा उनसे पूछंवा कि ये मलाद् पिशाच योनि से किस प्रकार मुक्त हुए| इसके बारे में हमे बतलाइये|

इस पर गान्धर्व माल्यवान बोले कि हे देवेन्द्र ! भगवान विष्णु तथा जया एकादशी व्रत के प्रभाव से ही हम पिशाच योनि से मुक्त हो पाए है| इसके पश्चात भगवान इंद्र ने उनसे कहा कि हे माल्यवान . भगवान विष्णु की कृपा एवं एकादशी व्रत करने से ना केवल आपकी पिशाच योनि छमकट ग्ई ल ब गए है क्योंकि विष्णु और शिव के भक्त हमने भी पूजनीय है| आप लोग धन्य है| अब आप पुष्पवती के साथ जाकर विहार करो|

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