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Brihaspativar Vrat Katha in Hindi: श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा लिखित में

Bhumika Singh
Written ByBhumika Singh
Last UpdatedAugust 5, 2026
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श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा: हिंदू धर्म में, सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी विशेष देवता को समर्पित होता है। ख़ासकर बृहस्पतिवार (गुरुवार) का दिन विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह दिन भगवान विष्णु और बृहस्पति ग्रह से जुड़ा है। बृहस्पति ग्रह को देवताओ का गुरु कहा जाता है।

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती है तथा व्रत रख कर बृहस्पति व्रत कथा को सुना जाता है। गुरुवार के दिन पीले वस्त्र पहन ने का विधान है।

बृहस्पति व्रत कथा की कथाएँ उन लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं जो नियमित रूप से बृहस्पति पूजा करते हैं।

श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा

बृहस्पति व्रत कथा मूल रूप से एक ऐसी कहानी है जो किसी के जीवन में बृहस्पति व्रत और बृहस्पति पूजा के महत्व को उजागर करती है।

इस दिन को पूजा, अनुष्ठान और दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। व्यक्ति को उसके पापों से छुटकारा मिलता है, उसे शक्ति, वीरता, दीर्घायु आदि प्राप्त करने में मदद मिलती है।

आइए 99Pandit के साथ जानें कि हिंदू धर्म में गुरुवारऔर बृहस्पति व्रत का महत्व। साथ ही जाने श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा के बारे में।

Brihaspativar Vrat Katha – श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा

भारतवर्ष में एक राजा राज्य करता था। वह बड़ा प्रतापी और दानी था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्‌मणों की सहायता करता था।

यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी।

एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे तो रानी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा मांगी लेकिन रानी ने भिक्षा देने से इन्कार कर दिया। रानी ने कहा मेरी इच्छा है कि हमारा धन नष्ट हो जाए फिर न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।

साधु ने रानी को अच्छे काम करने का उपदेश दिया परन्तु रानी पर उपदेश का कोई प्रभाव न पड़ा। वह बोली- महाराज आप मुझे कुछ न समझाएं।

मैं ऐसा धन नहीं चाहती जो हर जगह बांटती फिरूं। फिर साधु ने कहा, अगर तुम्हारी ऐसी ही इच्छा है तो तथास्तु!

तुम ऐसा करना कि बृहस्पतिवार को घर लीपकर पीली मिट्‌टी से अपना सिर धोकर स्नान करना, भट्‌टी चढ़ाकर कपड़े धोना, ऐसा करने से आपका सारा धन नष्ट हो जाएगा।

इतना कहकर वह साधु महाराज वहां से आलोप हो गये। जैसा साधु ने कहा रानी ने वैसा ही किया। छः बृहस्पतिवार ही बीते थे कि उसका समस्त धन नष्ट हो गया और भोजन के लिए दोनों तरसने लगे।

घर के ऐसे हालत देख राजा ने रानी से कहा कि यहां पर मुझे सभी मनुष्य जानते हैं इसलिए कोई कार्य नहीं कर सकता।

देश चोरी परदेश भीख बराबर है ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया। वहां जंगल को जाता और लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेंचता इस तरह जीवन व्यतीत करने लगा।

राजा को मिले साधु के रूप में बृहस्पति देव

एक दिन दुःखी होकर जंगल में एक पेड के नीचे आसन जमाकर बैठ गया। वह अपनी दशा को याद करके व्याकुल होने लगा।

बृहस्पतिवार का दिन था। एकाएक उसने देखा कि निर्जन वन में एक साधु प्रकट हुए। वह साधु वेष में स्वयं बृहस्पति देवता थे।

लकडहारे के सामने आकर बोले- हे लकडहारे! इस सुनसान जंगल में तू चिन्ता मग्न क्यों बैठा है? लकडहारे ने उत्तर दिया- महात्मा जी! आप सब कुछ जानते हैं और साधु को आत्मकथा सुनाई।

साधु ने बताया कि तुम्हारी स्त्री ने बृहस्पति के दिन वीर भगवान का निरादर किया था, जिसके कारण भगवान रुष्ट है। परंतु तुम चिंता मत करो जैसा में कहता हूं वैसा करो सब ठीक होगा।

फिर साधु ने राजा से श्री बृहस्पति व्रत कथा करने को कहा। धीरे-धीरे समय व्यतीत होने पर फिर वही बृहस्पतिवार का दिन आया।

लकड़हारा जंगल से लकड़ी काटकर किसी भी शहर में बेचने गया उसे उस दिन और दिन से अधिक पैसा मिला। राजा ने चना गुड आदि लाकर गुरुवार का व्रत किया। उस दिन से उसके सभी क्लेश दूर हुए।

परन्तु जब दुबारा गुरुवार का दिन आया तो बृहस्पतिवार का व्रत करना भूल गया। इस कारण बृहस्पति भगवान नाराज हो गए।

उस दिन से उस नगर के राजा ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया तथा शहर में यह घोषणा करा दी कि कोई भी मनुष्य अपने घर में भोजन न बनावे न आग जलावे और जो आज्ञा का पालन नहीं करेगा उसको फांसी की सजा दी जाएगी।

लेकिन लकड़हारा कुछ देर से पहुंचा इसलिए राजा उसको अपने साथ घर लिवा ले गए और ले जाकर भोजन करा रहे थे तो रानी की दृष्टि उस खूंटी पर पड़ी जिस पर उसका हार लटका हुआ था।

वह वहां पर दिखाई न दिया। रानी ने निश्चय किया कि मेरा हार इस मनुष्य ने चुरा लिया है। उसी समय सिपाहियों को बुलाकर उसको कारागार में डलवा दिया।

कारागार में राजा ने किया बृहस्पतिवार व्रत

कारागार में राजा को साधु का ध्यान आया और अपनी गलती का एहसास हुआ। राजा ने अगले बृहस्पतिवार को श्राद्ध पूर्व व्रत किया और कथा सुनी।

उसी रात्रि को बृहस्पतिदेव ने उस नगर के राजा को स्वप्न में कहा- हे राजा! तूमने जिस आदमी को कारागार में बन्द कर दिया है वह निर्दोष है। वह राजा है उसे छोड देना। रानी का हार उसी खूंटी पर लटका है।

राजा ने लकड़हारे को बुलाकर क्षमा मांगी तथा सुन्दर वस्त्र आभूषण देकर विदा करा। उसके बाद राजा ने अपने नगर को प्रस्थान किया।

जब राजा राज्य के निकट पहुंचे तो उसने देखा कि नगर पहले से और भी ज्यादा समृद्ध हो गया है। उसने नगरवासी से इसका कारण पूछा उसने बताया कि रानी ने ये सब किया है।

तब राजा ने क्रोध करके अपनी रानी से पूछा कि यह धन तुम्हें कैसे प्राप्त हुआ है तब उन्होंने कहा- हमें यह सब धन बृहस्पतिदेव के इस व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है। फिर राजा दिन में तीन बार कहानी कहने लगा तथा रोज व्रत करने लगा।

एक रोज राजा ने विचार किया कि चलो अपनी बहन के यहां हो आवें। इस तरह निश्चय कर राजा घोड़े पर सवार हो अपनी बहन के यहां को चलने लगा।

रास्ते में राजा को जो कोई भी मिलता वो उसको बृहस्पतिवार व्रत कथा सुनाता। इस प्रकार राजा अपनी बहन के घर पहुंचा। बहन ने भाई की खूब मेहमानी की।

दूसरे रोज प्रातःकाल राजा जगा तो वह देखने लगा कि सब लोग भोजन कर रहे हैं। राजा ने अपनी बहन से कहा- ऐसा कोई मनुष्य है जिसने भोजन नहीं किया हो, मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन ले।

बहन ने कहा यहां लोग पहले भोजन करते हैं बाद में कोई काम। वह एक कुम्हार के घर गई जिसका लड़का बीमार था। उसे मालूम हुआ कि उनके यहां तीन रोज से किसी ने भोजन नहीं किया है।

राजा ने जाकर बृहस्पतिवार की कथा कही जिसको सुनकर उसका लड़का ठीक हो गया अब तो राजा की प्रशंसा होने लगी।

बृहस्पतिदेव ने दिया पुत्र होने का वरदान

एक दिन राजा ने बहन से उसके साथ घर चलने को कहा। बहन ने कहा मैं तो चलूंगी पर कोई बालक नहीं जाएगा। राजा बोला जब कोई बालक नहीं चलेगा, तब तुम क्या करोगी। बड़े दुखी मन से राजा अपने नगर को लौट आया।

बड़े दुखी मन से राजा अपने नगर को लौट आया। उसने रानी को कोई बालक ना होने पर दुखी होने की बात बताई। रानी ने बृहस्पतिदेव से औलाद देने की बात कही।

उसी रात को बृहस्पतिदेव ने राजा से स्वप्न में कहा- हे राजा उठ। सभी सोच त्याग दे तेरी रानी गर्भ से है। राजा की यह बात सुनकर बड़ी खुशी हुई। नवें महीने में उसके गर्भ से एक सुन्दर पुत्र पैदा हुआ।

जब राजा की बहिन ने यह शुभ समाचार सुना तो वह बहुत खुश हुई तथा बधाई लेकर अपने भाई के यहां आई, तभी रानी ने उसे बहुत सुनाया।

राजा की बहन ने कहा कि अगर मैं ऐसा न कहती तो तुम्हें औलाद कैसे मिलती। बृहस्पतिदेव ऐसे ही हैं, जैसी जिसके मन में कामनाएं हैं, सभी को पूर्ण करते हैं, जो सदभावनापूर्वक बृहस्पतिवार का व्रत करता है एवं कथा पढता है अथवा सुनता है दूसरो को सुनाता है, बृहस्पतिदेव उसकी मनोकामना पूर्ण करते हैं।

भगवान बृहस्पतिदेव सदैव सभी की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। जैसी सच्ची भावना से रानी और राजा ने उनकी कथा का गुणगान किया तो उनकी सभी इच्छायें बृहस्पतिदेव जी ने पूर्ण की थीं।

इसलिए पूर्ण कथा सुनने के बाद प्रसाद लेकर जाना चाहिए। हृदय से उसका मनन करते हुए जयकारा बोलना चाहिए।

॥ बोलो बृहस्पतिदेव की जय ॥
॥ भगवान विष्णु की जय ॥

Katha 2

प्राचीन काल में एक ब्राह्‌मण रहता था, वह बहुत निर्धन था। उसके कोई सन्तान नहीं थी। उसकी स्त्री बहुत मलीनता के साथ रहती थी।

वह स्नान न करती, किसी देवता का पूजन न करती, इससे ब्राह्‌मण देवता बड़े दुःखी थे। बेचारे बहुत कुछ कहते थे किन्तु उसका कुछ परिणाम न निकला।

भगवान की कृपा से ब्राह्‌मण की स्त्री के कन्या रूपी रत्न पैदा हुआ। कन्या बड़ी होने पर प्रातः स्नान करके विष्णु भगवान का जाप व बृहस्पतिवार का व्रत करने लगी।

श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा

अपने पूजन-पाठ को समाप्त करके विद्यालय जाती तो अपनी मुट्‌ठी में जौ भरके ले जाती और पाठशाला के मार्ग में डालती जाती। तब ये जौ स्वर्ण के जो जाते लौटते समय उनको बीन कर घर ले आती थी।

एक दिन वह बालिका सूप में उस सोने के जौ को फटककर साफ कर रही थी। उसके पिता ने देख लिया और कहा – हे बेटी! सोने के जौ के लिए सोने का सूप होना चाहिए।

दूसरे दिन बृहस्पतिवार था इस कन्या ने व्रत रखा और बृहस्पतिदेव से प्रार्थना करके कहा- मैंने आपकी पूजा सच्चे मन से की हो तो मेरे लिए सोने का सूप दे दो। बृहस्पतिदेव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। बृहस्पतिदेव की कृपा से सोने का सूप मिला।

बृहस्पतिदेव की महिमा

एक दिन की बात है कि वह कन्या सोने के सूप में जौ साफ कर रही थी। उस समय उस शहर का राजपुत्र वहां से होकर निकला।

इस कन्या के रूप और कार्य को देखकर मोहित हो गया तथा अपने घर आकर भोजन तथा जल त्याग कर उदास होकर लेट गया।

राजा को इस बात का पता लगा तो उसने बेटे से इसका कारण पूछा। वह बोला- मैं उस लड़की से विवाह करना चाहता हूं जो सोने के सूप में जौ साफ कर रही थी।

राजा ने कहा तुम हमें कन्या का पता लगाओ। मैं उसके साथ तेरा विवाह अवश्य ही करवा दूंगा। राजकुमार ने उस लड़की के घर का पता बतलाया।

ब्राह्‌मण देवता राजकुमार के साथ अपनी कन्या का विवाह करने के लिए तैयार हो गए तथा विधि-विधान के अनुसार ब्राह्‌मण की कन्या का विवाह राजकुमार के साथ हो गया।

कन्या के घर से जाते ही पहले की भांति उस ब्राह्‌मण देवता के घर में गरीबी का निवास हो गया। एक दिन दुःखी होकर ब्राह्‌मण देवता अपनी पुत्री के पास गए। तब ब्राह्‌मण ने सभी हाल कहा।

लड़की ने कहा कि आप माँ को यहाँ लिवा लाओ। मैं उन्हें बृहस्पतिवार व्रत की विधि बता दूंगी जिससे आपकी गरीबी भी दूर हो जाएगी।

परन्तु उसकी मां ने एक भी बात नहीं मानी। बेटी को बहुत गुस्सा आया उसने माँ को कोठरी में बंद कर दिया।

प्रातःकाल उसे निकाला तथा स्नानादि कराके पाठ करवाया तो उसकी मां की बुद्धि ठीक हो गई और फिर प्रत्येक बृहस्पतिवार को व्रत रखने लगी।

इस व्रत के प्रभाव से उसके मां बाप बहुत ही धनवान और पुत्रवान हो गए और बृहस्पतिजी के प्रभाव से इस लोक के सुख भोगकर स्वर्ग को प्राप्त हुए।

॥ बोलो बृहस्पतिदेव की जय ॥
॥ भगवान विष्णु की जय ॥

बृहस्पतिवार की पूजा पद्धति

उपवास और प्रार्थना

कई हिंदू भगवान विष्णु और बृहस्पति के सम्मान में गुरुवार को व्रत रखते हैं, जिसे ” गुरुवार व्रत ” के नाम से जाना जाता है।

भक्त कुछ खाद्य पदार्थ खाने से परहेज करते हैं, खासकर अनाज से बने खाद्य पदार्थ, और इसके बजाय फल, दूध और अन्य सात्विक (शुद्ध) खाद्य पदार्थ खाते हैं।

श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा

व्रत में आमतौर पर प्रार्थना, मंत्रों का जाप और विष्णु सहस्रनाम जैसे पवित्र ग्रंथों का पाठ किया जाता है।

पीला: बृहस्पति का रंग

गुरुवार के लिए पीला रंग शुभ माना जाता है । भक्त पीले कपड़े पहनते हैं, पीले फूल चढ़ाते हैं और देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पीले चावल या केसर से बनी मिठाइयाँ जैसे खाद्य पदार्थ तैयार करते हैं। पीला रंग ज्ञान, समृद्धि और खुशी का प्रतीक है, जो भगवान विष्णु और बृहस्पति से जुड़े सभी गुण हैं।

मंदिर के दर्शन और अनुष्ठान

गुरुवार को भगवान विष्णु या बृहस्पति को समर्पित मंदिरों में जाना एक आम बात है। दैवीय आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विशेष अनुष्ठान और प्रसाद, जैसे कि दीपक जलाना, फूल चढ़ाना और आरती (दीपों के साथ एक भक्ति अनुष्ठान) करना, आयोजित किया जाता है।

कुछ मंदिर भक्तों को आध्यात्मिक समृद्धि प्रदान करने के लिए विष्णु की कहानियों और शिक्षाओं का पाठ भी आयोजित करते हैं।

निष्कर्ष

हिंदू धर्म में बृहस्पतिवार (गुरूवार) का विशेष महत्व है क्योंकि यह दिन भगवान विष्णु और बृहस्पति को समर्पित है। इस दिन श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा पाठ करना भी बहुत शुभ माना जाता है।

उपवास, प्रार्थना और पीले रंग के कपड़े पहनकर, भक्त ज्ञान, समृद्धि और सुरक्षा के लिए इन शक्तिशाली देवताओं का आशीर्वाद मांगते हैं।

गुरूवार के दिन लोग भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की आराधना करते हैं। इसके साथ ही श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा का पाठ करते हैं और श्रद्धापूर्वक व्रत का पालन करते हैं। भगवान विष्णु की कृपा से उन लोगों को कभी धन संपत्ति की कमी नहीं होती।

बृहस्पतिवार के दिन चना दाल, केला और केसर जैसी पीली वस्तुओं का दान करने से वैवाहिक जीवन में खुशियाँ आती हैं।

जिन लोगों की शादी में देरी हो रही है या नौकरी या व्यापार में बाधा आ रही है, उन्हें बृहस्पतिवार का व्रत रखना चाहिए। इससे पुण्य और सकारात्मक परिणाम मिलते हैं।

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Frequently Asked Questions

हिंदू धर्म में बृहस्पतिवार को किस भगवान की पूजा की जाती है?

बृहस्पतिवार का दिन भगवान विष्णु और बृहस्पति को समर्पित है, जो देवताओं के गुरु हैं।

बृहस्पतिवार व्रत कथा करने से क्या लाभ हैं?

गुरुवार को भगवान विष्णु की पूजा करने और बृहस्पतिवार व्रत कथा करने से बुद्धि, समृद्धि, सुरक्षा और आध्यात्मिक विकास प्राप्त होता है। इसे नए उद्यम और शैक्षिक गतिविधियों को शुरू करने के लिए भी शुभ माना जाता है।

पीला रंग बृहस्पतिवार से क्यों जुड़ा है?

पीला रंग ज्ञान, समृद्धि और खुशी का प्रतीक है, जो भगवान विष्णु और बृहस्पति से जुड़े गुण हैं। इसे गुरुवार की पूजा के लिए शुभ रंग माना जाता है।

बृहस्पतिवार व्रत कथा और पूजा कैसे करते हैं?

गुरुवार के दिन लोग सुबह जल्दी उठ कर भगवान विष्णु की कथा करते हैं। उपवास रखते हैं, पीले कपड़े पहनते हैं, मंदिर जाते हैं, पीले फूल और भोजन चढ़ाते हैं, तथा भगवान विष्णु और बृहस्पति को समर्पित अनुष्ठान करते हैं।


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