KathaNirjala Ekadashi Vrat Katha in Hindi: निर्जला एकादशी व्रत कथा
निर्जला एकादशी व्रत कथा: निर्जला एकादशी साल की सभी एकादशियों में सबसे खास मानी जाती है। यह व्रत…
calendar_today Jul 16, 2025
कृष्ण जन्माष्टमी व्रत से सब संकट दूर होते हैं। यहाँ आपको साल 2026 का सही मुहूर्त, संपूर्ण जन्माष्टमी व्रत कथा, पूजा सामग्री और व्रत के नियम मिलेंगे।
जन्माष्टमी सिर्फ एक त्योहार नहीं है। यह वह रात है जब भगवान ने कारावास में जन्म लिया। दुनिया से पाप खत्म करने के लिए कान्हा धरती पर आए थे।
मान्यता है कि सच्ची भक्ति से Janmashtami Vrat Katha सुनने पर एक हजार एकादशी के बराबर पुण्य मिलता है।
इससे घर में सुख और शांति आती है। लेकिन क्या आप पूजा का सही तरीका और नियम जानते हैं? अक्सर लोग पूजा में कुछ छोटी गलतियां कर देते हैं। आपकी पूजा अधूरी न रहे, इसीलिए हम यह गाइड लाए हैं।
इस ब्लॉग में आपको क्या-क्या मिलेगा:
इसे पढ़कर आप अपनी पूजा को पूरी तरह सफल बना सकते हैं। आइए, मिलकर कान्हा का जन्मदिन मनाते हैं।
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साल 2026 में भगवान कृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। सही समय पर पूजा का पूरा फल पाने के लिए मुख्य टाइमिंग नीचे दी गई है:
| शहर | पूजा का समय (4-5 सितंबर 2026) |
| कोलकाता | रात 11:13 PM से 11:59 PM (4 Sep) |
| चेन्नई | रात 11:45 PM से 12:31 AM |
| हैदराबाद | रात 11:52 PM से 12:38 AM |
| बेंगलुरु | रात 11:55 PM से 12:42 AM |
| दिल्ली / नोएडा | रात 11:57 PM से 12:43 AM / 12:42 AM |
| गुड़गांव | रात 11:58 PM से 12:44 AM |
| चंडीगढ़ | रात 11:59 PM से 12:45 AM |
| जयपुर | रात 12:03 AM से 12:49 AM |
| पुणे | रात 12:10 AM से 12:57 AM |
| मुंबई | रात 12:14 AM से 01:01 AM |
| अहमदाबाद | रात 12:16 AM से 01:02 AM |
नोट: इस रात चंद्रोदय (चांद निकलने का समय) रात 11:40 PM पर होगा।
द्वापर युग में जब पृथ्वी पर पाप और अत्याचार बहुत अधिक बढ़ गए, तब पृथ्वी गाय का रूप धारण करके ब्रह्मा जी के पास गई।
ब्रह्मा जी सभी देवताओं को लेकर क्षीर सागर में भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने आकाशवाणी की- “हे देवताओं! भयभीत मत हो।
मैं कंस के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मथुरा में वासुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से ८वें पुत्र के रूप में अवतार लूंगा।”
मथुरा नगरी में उग्रसेन का पुत्र कंस एक अत्यंत क्रूर राजा था। उसने अपने पिता को भी बंदी बना लिया था। कंस अपनी चचेरी बहन देवकी से बहुत प्रेम करता था।
जब देवकी का विवाह यदुवंशी वासुदेव जी के साथ हुआ, तो कंस स्वयं रथ हांककर उन्हें विदा करने चला। मार्ग में अचानक एक भयंकर आकाशवाणी हुई – “हे मूर्ख कंस! जिस बहन को तू इतने प्रेम से ले जा रहा है, उसी के गर्भ से उत्पन्न होने वाली ८वीं संतान तेरा वध करेगी।”
यह सुनते ही कंस ने क्रोध में आकर देवकी को मारने के लिए तलवार निकाल ली। तब वासुदेव जी ने कंस को शांत करते हुए वचन दिया— “कंस! तुम्हें देवकी से कोई भय नहीं है। इससे जो भी संतान होगी, मैं उसे स्वयं तुम्हें सौंप दूँगा।”
वासुदेव जी के वचन पर विश्वास करके कंस ने दोनों को जेल (कारागार) में डाल दिया और कड़े पहरे लगा दिए।
देवकी के गर्भ से जो भी बालक जन्म लेता है, कंस उसे पत्थर पर पटककर मार डालता है। इस प्रकार उसने देवकी के ६ पुत्रों को मार दिया।
७वें गर्भ में स्वयं शेषनाग जी आए, जिन्हें योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया, जो बाद में बलराम जी कहलाए।
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, रोहिणी नक्षत्र में, अर्धरात्रि (रात के १२ बजे) के समय भगवान विष्णु ने अपने चतुर्भुज रूप में अवतार लिया।
उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे। कारागार में अचानक अलौकिक प्रकाश फैल गया। भगवान ने वासुदेव और देवकी को उनके पूर्वजन्म (पृश्नि और सुतपा) का स्मरण कराया और कहा— “पिताजी! आप घबराएं नहीं।
आप मुझे अभी इसी समय गोकुल में अपने मित्र नंदबाबा के घर छोड़ आएं और वहाँ जन्मी योगमाया (कन्या) को यहाँ ले आएं।”
भगवान की माया से कारागार के सभी पहरेदार गहरी नींद में सो गए और लोहे के भारी दरवाजे तथा बेड़ियाँ स्वतः ही खुल गईं।
घनघोर वर्षा हो रही थी। वासुदेव जी ने बालक कृष्ण को सूप (टोकरी) में रखा और गोकुल की ओर चल पड़े।
उफनती हुई यमुना नदी भगवान के चरणों को स्पर्श करने के लिए बढ़ने लगी। जैसे ही श्रीकृष्ण ने अपने पैर टोकरी से बाहर निकालकर यमुना जी का स्पर्श किया, यमुना का जल शांत हो गया और वासुदेव जी को मार्ग मिल गया। शेषनाग ने अपने फनों से भगवान पर छतरी तान दी।
वासुदेव जी सुरक्षित गोकुल पहुंचे, जहाँ यशोदा माता ने एक कन्या को जन्म दिया था, लेकिन वे अचेत थीं। वासुदेव जी ने श्रीकृष्ण को यशोदा जी के पास सुला दिया और उस नवजात कन्या को लेकर वापस मथुरा कारागार आ गए।
उनके आते ही जेल के दरवाजे फिर से बंद हो गए और बेड़ियाँ जकड़ गईं। जब कन्या के रोने की आवाज सुनकर कंस वहाँ आया, तो उसने उस कन्या को पैर से पकड़कर पत्थर पर पटकना चाहा।
लेकिन वह कन्या कंस के हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई और उसने अष्टभुजा देवी का रूप धारण कर लिया।
देवी ने अट्टहास करते हुए कहा— “अरे मूर्ख कंस! मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारने वाला तो गोकुल में जन्म ले चुका है।”
यह सुनकर कंस अत्यंत भयभीत हो गया। बाद में गोकुल में रहते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने पूतना, शकटासुर, तृणावर्त और कंस द्वारा भेजे गए अनेक राक्षसों का वध किया।
अंत में श्रीकृष्ण ने मथुरा आकर कंस का वध किया और माता देवकी, पिता वासुदेव तथा राजा उग्रसेन को मुक्त कराया।
जो भी श्रद्धालु इस प्राकट्य कथा का श्रवण या पाठ पूर्ण श्रद्धा से करता है, उसके सांसारिक कष्ट दूर होते हैं और अंत में वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
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जन्माष्टमी व्रत में शुद्धता बहुत जरूरी है। अगर आप पहली बार व्रत रख रहे हैं, तो इन 5 आसान नियमों को समझ लें:
जन्माष्टमी की पूजा आधी रात को होती है, इसलिए ऐन वक्त की हड़बड़ी से बचने के लिए सामग्री पहले ही जुटा लें। आपकी सुविधा के लिए पूरी चेकलिस्ट को 5 जरूरी श्रेणियों में बांटा गया है:
कान्हा के अभिषेक के लिए पंचामृत सबसे महत्वपूर्ण है। इसके लिए इन 5 चीजों को सही अनुपात में मिलाएं:
बाल गोपाल के जन्मोत्सव पर उनका नए दूल्हे की तरह श्रृंगार किया जाता है। इसके लिए यह सामान रखें:
जन्म के बाद बाल गोपाल को झूले में बिठाकर झुलाया जाता है। इसके लिए यह सामान तैयार रखें:
पूजा की थाली तैयार करते समय इन सात्विक और पवित्र चीजों को शामिल करें:
मध्यरात्रि की महाआरती और जन्मोत्सव के जयकारों के लिए यह सामान पास रखें:
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कान्हा की पूजा इन 5 मुख्य भोग के बिना अधूरी मानी जाती है:
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के व्रत और पूजा को सफल बनाने के लिए इन 5 सिद्ध मंत्र और उनका हिंदी अर्थ नीचे दिया गया है:
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”अर्थ: मैं सर्वव्यापी, परमेश्वर और वासुदेव के पुत्र भगवान श्रीकृष्ण को सादर नमन करता हूँ। यह द्वादशाक्षर (12 अक्षरों का) मंत्र जीवन के सभी कष्टों को दूर कर सफलता प्रदान करता है।
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥”अर्थ: हे भगवान कृष्ण! हे भगवान राम! और हे हरि (भगवान की आंतरिक शक्ति)! मुझे अपनी दिव्य सेवा में लगाइए और मेरे मन को परम शांति व शुद्धि प्रदान कीजिए।
“देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥”अर्थ: हे देवकी के पुत्र, हे गोविंद, हे वासुदेव, हे संपूर्ण जगत के स्वामी भगवान कृष्ण! मुझे (योग्य) संतान प्रदान कीजिए, मैं आपकी शरण में आया/आई हूँ।
“क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।”अर्थ: ब्रह्मांड के रक्षक (गोविंद) और गोपियों के अत्यंत प्रिय (गोपीजनवल्लभ) भगवान कृष्ण को मैं स्वयं को समर्पित करता हूँ। यह मंत्र जीवन के हर संकट को नष्ट कर इच्छाएं पूरी करता है।
“अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर॥”अर्थ: हे परमेश्वर! मेरे द्वारा दिन-रात हजारों अपराध (भूलें) होते रहते हैं। मुझे अपना भक्त या दास मानकर मेरी उन सभी अनजानी गलतियों को क्षमा करें।
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जन्माष्टमी के इस महाव्रत को करने से भक्तों को ये 5 मुख्य लाभ मिलते हैं:
जन्माष्टमी व्रत कथा सिर्फ एक पौराणिक कहानी नहीं है। यह भगवान कृष्ण का वह शाश्वत वचन है, जो याद दिलाता है कि जब-जब संसार में पाप बढ़ेगा, वे अपने भक्तों की रक्षा के लिए जरूर आएंगे।
इसलिए इस पावन त्योहार पर पूजा के हर नियम को पूरी श्रद्धा और प्रेम के साथ निभाएं। इस साल की जन्माष्टमी को वह रात बनाएं, जब बाल गोपाल का प्राकट्य न सिर्फ आपके घर के मंदिर में, बल्कि सच में आपके हृदय में भी हो।
क्या आप इस बार अपने घर पर जन्माष्टमी पूजा करवाना चाहते हैं? किसी भी भ्रम या कमी से बचने के लिए आप 99Pandit पर जा सकते हैं।
वहाँ आपको पूजा के लिए सबसे अनुभवी और विद्वान पंडित आसानी से मिल जाएंगे। तो देर किस बात की? आज ही 99Pandit पर जाएँ और अपनी पूजा अभी बुक करें। जय श्री कृष्णा!
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हाँ, व्रत के पूर्ण फल के लिए कथा सुनना या पढ़ना जरूरी है। समय न होने पर मोबाइल पर कथा सुनें।
हाँ, लेकिन उन्हें निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए। बच्चे की सेहत के लिए दिनभर फल, दूध और जूस लेते रहें।
मुख्य पूजा आधी रात को ही होती है। अगर आप रात में नहीं जाग सकते, तो शाम को ही लड्डू गोपाल का श्रृंगार करें, भोग लगाएं, उन्हें झुलाएं और फिर सुला दें।
चाय-कॉफी में कैफीन होता है, इसलिए इन्हें सात्विक नहीं माना जाता। कमजोरी से बचने के लिए लोग इसे पी लेते हैं, लेकिन दूध या ज्यूस पीना बेहतर है।
बिल्कुल नहीं। आपके पुराने लड्डू गोपाल ही परिवार के सदस्य हैं। हर साल सिर्फ उनके नए वस्त्र, मुकुट, बांसुरी और झूला बदलें।
इसके दो नियम हैं। कई लोग रात 12 बजे जन्म की आरती और भोग के तुरंत बाद व्रत खोल लेते हैं। वहीं कुछ लोग अगले दिन सुबह सूर्योदय के बाद पारण करते हैं।
हाँ, आप व्रत रख सकती हैं और मन में मंत्र जाप कर सकती हैं। बस पूजा की सामग्री और मूर्ति को न छुएं। अपने बदले घर के किसी अन्य सदस्य से पूजा करवा लें।