व्रत की परंपरा हिन्दू धर्म में अत्यंत पुरानी और धार्मिक रूप से समृद्ध रही है| इन व्रतों में एकादशी को प्रथम व्रत माना जाता है, ‘एकादशी’ शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘ग्यारहवा दिन’|
यह दिन हर महीने में 2 बार आता है शुक्ल पक्ष (चंद्रमा का उदय) कृष्ण पक्ष (चंद्रमा का अस्त)| एक वर्ष में कुल 24 एकादशी होती है, और कई बार मलमास के कारण यह संख्या 26 तक पहुँच जाती है|

एकादशी व्रत का सबसे अधिक संबंध भगवान विष्णु से है। पुराणों के अनुसार, जो कोई भी इस दिन व्रत रखता है और भगवान विष्णु की पूजा करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।
यह व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं है, बल्कि इसके वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी हैं। व्रत रखने से पाचन तंत्र को एक दिन का आराम मिलता है, जिससे पाचन तंत्र बेहतर होता है और मन को शांति मिलती है|
योगिनी एकादशी व्रत कथा, विधि, सामग्री, महत्व और पूजा से संबंधित सभी जानकारी नीचे विस्तार से दी गई है ताकि पाठक इसे समझकर सही ढंग से पालन कर सकें।
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यह एकादशी व्रत हिंदू धर्म में एक बहुत बड़ा पुण्यदायक और धार्मिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है, जो आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को पालन किया जाता है। यह व्रत खासतौर पर पापों से छूट, आत्मिक शुद्धि और स्वास्थ्य लाभ के लिए किया जाता है।
मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा, नियम और संयम के साथ करने पर व्यक्ति को जन्म-जन्मांतर के पापों से छूट मिलती है और उसकी जिंदगी सुख-शांति से भर जाती है।
इस दिन उपवासी व्यक्ति अन्न, तामसिक चीजों, झूठ, क्रोध और बुरे कामों से पूरी तरह अस्वीकार करते है। व्रत का तात्कालिक उद्देश्य उपवास किया जाना ही नहीं, पुरे मन, वाणी और कर्म से भी शुद्ध रहना होता है।
इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है और रात को जागरण और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है।
योगिनी एकादशी को विशेष रूप से उनके लिए लाभकारी माना गया है जो मानसिक दबाव, घर की दिक्कत, बीमारियों का सामना कर रहे हैं या जीवन में लगातार बाधाओं का सामना कर रहें है। यह व्रत जीवन में शुभ भाव, शांति कल्याण, दिमागी और सकारात्मक ऊर्जा आने में सहायक होता है।
पुराणों के अनुसार, इस एकादशी का होने का महत्व हजार गौधान, सोने का दान और तीर्थयात्रा के बराबर होता है। इस व्रत को करने से जीवन पवित्र हो जाता है और मोक्ष की दिशा में बड़ा कदम बढ़ता है।
योगिनी एकादशी की कथा पद्म पुराण में है, जो भगवान श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर के बीच संवाद के रूप में आती है।
एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे माधव! आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? कृपया इसकी कथा और विशेषता बतायें!”
भगवान कृष्ण ने कहा, “हे राजन! इस एकादशी को योगिनी कहा जाता है। यह सभी पापों का नाश कर देती है, रोगों को दूर करती है और मुक्ति प्रदान करती है। इसकी कथा प्राचीन काल में अलकापुरी के राजा कुबेर से जुड़ी है।
कुबेर भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे और वे प्रतिदिन शिव को सुंदर पुष्प अर्पित करते थे। इन पुष्पों को लाने का कार्य हेम माली नामक एक गंधर्व का था, जो अत्यंत कुशल सेवक था।
हेम माली की पत्नी विशालाक्षी बहुत सुंदर थी| एक दिन हेम माली अपनी पत्नी के सुन्दरता और उसके मोह में भटक गया और रमण करने लगा|
इस कारण वह समय पर पुष्प नहीं ला सका, जिससे वह राजा कुबेर के दरबार में अनुपस्थित रहा। राजा कुबेर ने अपने सिपाहियों को आदेश दिया की जा कर देखो की हेम माली क्यों नही आया वह क्या कर रहा हैं, तो उसके सिपाहियों ने कहा कि – महाराज वह बहुत वासना से पूर्ण इंसान है वह अपनी पत्नी के साथ रमण कर रहा होगा|
यह सब सुनकर कुबेर बहुत भड़क गए और उन्होंने हेम माली को श्राप दिया, “तू मृत्युलोक में जाकर कुष्ठ रोग से फ़सा रहेगा और वहाँ बहुत पीड़ा सहेगा”
कुबेर के श्राप के कारण हेम माली पृथ्वी पर गिर पड़ा और हिमालय के नीचे वाले सरोवर में आकर अत्यंत दर्द पूर्ण जीवन बिताने लगा। उसके शरीर पर कोढ़ हो गया था और वह भूखा-प्यासा, उदास और मायूस होकर वनों में भटकता रहा।
वह एक दिन महातपस्वी महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम में पहुँचा, वहा महर्षि ने उससे पूछा की वो है कौन और इस अवस्था में कैसे है?
उसने वहा भोजन गृहण किया और खाने खाते हुए अपनी कथा सुनाई, यह सब सुनकर महर्षि मार्कण्डेय को उसके ऊपर दया आ गई।
उन्होंने कहा, “हे गंधर्व! तुमने अपने कर्तव्य से विमुख होकर अपराध तो किया है, किन्तु इस लोक में ऐसा कोई पाप या दोष नहीं जो प्रायश्चित और भक्ति से ख़तम न हो।
“तुम्हें आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करना चाहिए, तुम्हारे सभी पापों का नाश होगा और तुम्हें अपना पुराना रूप प्राप्त होगा।
हेम माली ने भी ऐसा ही किया। उसने पूरी श्रद्धा और नियम से योगिनी एकादशी का व्रत किया, भगवान विष्णु की पूजा की और अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए भक्तिपूर्वक व्रत रखा।
कुछ ही समय में उसका शरीर स्वस्थ हो गया और वह पुनः स्वर्ग चला गया और अपने पुराने रूप, अपनी धर्म-पत्नी और स्थान को प्राप्त किया।
यह कहानी सिद्ध करती है कि योगिनी एकादशी का व्रत न तो केवल रोगों को शांत करता है, और न ही मन के मैल को दूर करता है, बल्कि मोक्ष भी देता है।
वह व्यक्ति जो इस व्रत को नियम और भक्तिपूर्वक करता है, उसे इस दुनिया में तंदरुस्त स्वास्थ्य और स्वर्गलोक में पुण्य मिलता है।
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योगिनी एकादशी आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को होती है। यह एकादशी विशेषता से पापों के नाश, रोगों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
यह एकादशी व्रत पद्म पुराण और स्कंद पुराण में वर्णित है, जिसमें इसे समस्त पापों को हरने वाली और अत्यंत पुण्यदायिनी तिथि कहा गया है।
इस व्रत की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मनुष्य के जीवन में की गई अनजानी गलतियों, किए गए पाप कर्मों और मन के अन्दर की भावनाओं को पवित्र करता है। इस व्रत को करने से मनुष्य न केवल इस जीवन में, बल्कि पिछले जीवन के पापों से भी मुक्त हो जाता है।

शास्त्रों के अनुसार, इस एकादशी का व्रत करने वाला इंसान 88,000 ब्राह्मण पंडितो को भोजन कराने के सामान होता है और इसका बहुत अच्छा फल प्राप्त होता हैं|
यह व्रत विशेषकर ऐसे लोगों के लिए हितकारी/लाभकारी माना जाता है जो अनवरत रूप से बीमारियों, दिमागी तनाव, परिवार के मध्य झगड़ा या उधार जैसी समस्याओं में दबावमुक्त रहते हैं।
योगिनी एकादशी व्रत करने पर जीवन में सुख, शांति और सफलता प्राप्त होती है। इसके अलावा, यह व्रत व्यक्ति को पवित्रता, नियंत्रण और भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा प्रदान करता है।
इस दिन भगवान विष्णु की पूजा विशेष फलदायक मानी जाती है। तुलसी पत्र अर्पण, व्रत कथा श्रवण, मंत्र जाप और जागरण से व्रत की उपलब्द्धि होती है।
जो व्यक्ति इस दिन उपवास रखकर नियमपूर्वक पूजा करता है, उसे वैकुंठ की प्राप्ति होती है। इसके अलावा योगिनी एकादशी व्रत सकारात्मक ऊर्जा और सदाचार को फैलाता है|
यह आत्मशुद्धि और आत्मबोध के साधन के रूप में कार्य करता है और व्यक्ति के जीवन को आध्यात्मिक दिशा देता है।
इस एकादशी व्रत के कई आध्यात्मिक, मानसिक और प्राकृतिक फायदे होते हैं। यह व्रत न सिर्फ पापों का नाश करता है, बल्कि जीवन को सुख, शांति और मोक्ष की दिशा भी दिखता है।
1. पापों से मुक्ति – शास्त्रों के अनुसार योगिनी एकादशी का व्रत करने से पिछले जन्मों और इस जन्म के सभी पापों का नाश होता है। इस व्रत से व्यक्ति को नैतिक और सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है।
2. रोगों और मानसिक अशांति से छुटकारा – जो व्यक्ति बार-बार बीमार रहते हैं, मानसिक तनाव या क्लेश से ग्रस्त हैं, उनके लिए यह व्रत बहुत फलदायक होता है। यह व्रत मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा देता है।
3. मुक्ति की प्राप्ति – भगवान विष्णु की कृपा से योगिनी एकादशी व्रत करने वाले को बैकुंठ (स्वर्ग) की प्राप्ति होती है। यह व्रत आत्मा की शुद्धि और मुक्ति के रास्ते पर एक बड़ा कदम माना जाता है।
4. कर्ज़, दरिद्रता और पारिवारिक संकट से छुटकारा – यह व्रत पारिवार के तनाव, कर्ज़ और आर्थिक (पैसो की समस्या) संकट से मुक्ति प्रदान करता है। घर में समृद्धि और सुख-शांति आती है।
5. पुण्य प्राप्ति – भक्ति भाव से इस व्रत का उपवास करने से 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य प्राप्त होते हैं। यह उपवास व्यक्ति के जीवन में बड़ा आध्यात्मिक परिवर्तन लाता है।
इस एकादशी व्रत के फायदे बहुत सारे हैं – यह न केवल पापों से मुक्ति प्रदान करता है, बल्कि जीवन को शुद्ध, शांत, पिछले जन्म के कर्मों का प्रायश्चित और सफलदायी हैं|
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“योगिनी” शब्द संस्कृत की भाषा से प्राप्त हुआ है। यह “योग” शब्द से आया है, जिसका अर्थ जोड़ना या मिलाना – आत्मा को परमात्मा से मिलना।
इसका शाब्दिक अर्थ होता है – “योग में स्थित स्त्री” या “जो योग का अभ्यास करती है” , “जो योग करती हैं”|
भारतीय धार्मिक, योग और तांत्रिक परंपराओं में योगिनी का महत्वपूर्ण स्थान है। योगिनी वह स्त्री होती है जो आत्मिक शक्ति में पारंगत होती है तथा ध्यान, साधना, तप में पारंगत होती है।
शास्त्रों में दिव्य शक्तियों वाली देवी के रूप में योगिनी का वर्णन किया गया है | शास्त्रों में 64 योगिनियों का वर्णन मिलता है, जो विभिन्न रूपों में ब्रह्मांड की शक्तियों का वर्णन करती हैं।
इन्हें दुर्गा, पार्वती या अन्य देवी शक्तियों का अंश माना जाता है। योगिनी एक साधारण स्त्री नहीं होती, इसे वह एक साधिका (सदाचारी और शुद्ध हृदय वाली) होती है जो अध्यात्म, योग और भक्ति में लीन रहती है।
आज के समय में भी योगिनी का अर्थ ऐसी महिला से लिया जा सकता है जो योग, ध्यान और आत्मिक विकास में रुचि रखती हो। इस तरह, “योगिनी” शब्द नारी शक्ति, साधना और योग की गहराई को प्रस्तुत करती है।
योगिनी एकादशी का व्रत आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु को अर्पित होता है और इसके प्रभाव से पापों का विनाश, रोगों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। योगिनी एकादशी की विधि सरल है, लेकिन श्रद्धा और नियम से इसका पालन अत्यंत आवश्यक है।
1. दशमी तिथि की तैयारी –
2. प्रातःकालीन स्नान और संकल्प –
3. पूजा विधि –
4. व्रत और उपवास –
5. रात्रि जागरण –
6. पारण विधि –
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योगिनी एकादशी व्रत को सफल रूप से आयोजित करने के लिए अनिवार्य पूजन सामग्री का संग्रह पहले से करना आवश्यक होता है।
यह एक ऐसा व्रत है जो भगवान विष्णु की उपासना से जुड़ा हुआ है, इसलिए सारी सामग्री सात्विक और शुद्ध होनी चाहिए।
निम्नलिखित योगिनी एकादशी व्रत में उपयोग होने वाली प्रमुख सामग्रियों की सूची दी गई है –
1. पूजा स्थान की व्यवस्था हेतु –
2. भगवान विष्णु की पूजा हेतु –
3. भोग और नैवेद्य (आमतौर पर फल, मिठाई, और अन्य खाद्य पदार्थ) हेतु –
4. व्रत कथा पाठ हेतु –
5. दान सामग्री –
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योगिनी एकादशी व्रत हिन्दू धर्म में एक बहुत ही पवित्र और फलदायी तिथि है, न केवल यह व्रत आध्यात्मिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक जीवन को भी सकारात्मक दिशा प्रदान करता है।
भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने और जीवन के समस्त पापों से मुक्ति पाने का यह बहुत ही सरल और प्रभावी माध्यम है।
योगिनी एकादशी व्रत कथा, व्रत की विधि, पूजा सामग्री, शुभ मुहूर्त और श्रद्धा से किया गया उपवास व्यक्ति को आत्मिक शुद्धि, मानसिक शांति और पुण्य की प्राप्ति कराता है।
जो भक्त सच्चे मन से योगिनी एकादशी का व्रत करता है, उसे रोग, दरिद्रता, ऋण और जीवन की अन्य कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है। साथ ही यह व्रत मोक्ष का द्वार खोलने वाला माना गया है।
आज के वर्तमान समय में ज्यादातर लोग समय की कमी के कारण विधिवत पूजन नहीं कर पाते, ऐसे में 99Pandit जैसी सेवा का उपयोग करके योग्य पंडित बुकिंग कर व्रत सही ढंग से कराया जा सकता है।
इसलिए योगिनी एकादशी किसी एक दिन की बात नहीं, लेकिन आत्मा की शुद्धता, भक्ति और जीवन को खुशियों की ओर ले जाने का त्योहार है।
इस व्रत को श्रद्धा, नियम और विधि से किए जाने के बाद निश्चित सीमा से यह जीवन आध्यात्मिक उन्नति और ईश्वर कृपा से धन्य कर देता है।
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एकादशी पर पुरे मनोभाव से भगवान विष्णु की पूजा की जाती हैं, माना जाता है की श्री विष्णु जीवन के सभी कष्टों को दूर करके उनका रास्ता निकालते है और हमे मोक्ष का वरदान देते है।
यह एकादशी सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और मानसिक पवित्रता में भी मदद करती है। योगिनी एकादशी का व्रत करने पर पुराने रोगों और पुराने कर्मों से मुक्ति मिलती अर्थात इस जन्म में अपने दुविचारो दुष्कर्मों का प्रायश्चित करने से पुण्य मिलता है।
हाँ, योगिनी एकादशी का व्रत करने से हमें पुण्य की प्राप्ति होती हैं अगर हम इसे पुरे भक्तिभाव से करे तो इसका पुण्य 88 हज़ार ब्राह्मणों को भोजन करने के बराबर होता हैं।
जी हाँ, इस दिन पीले या सफेद रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है क्योंकि यह भगवान विष्णु के प्रिय रंग हैं और सात्विकता का प्रतीक भी।
अगर आप शांत मन, समय और शुद्धता के साथ पूजा कर सकते हैं, तो घर पर ही करना अच्छा होगा। मंदिर जाना शुभ होता है, लेकिन भगवान भाव के द्वारा मानते हैं – स्थान के नहीं।