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Mrit Sanjeevani Stotram: मृत संजीवनी स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

Shalini Mishra
Written By Shalini Mishra
Last Updated June 13, 2026
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इस मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotram) में भगवान शिव की आराधना की जाती है तथा यह मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) पूर्ण रूप से भगवान शिव को ही समर्पित होता है| मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) का अर्थ – मृत्यु से मुक्ति का कवच होता है, जो भी व्यक्ति भगवान शिव की पूजा करते समय इस मृत संजीवनी स्तोत्र का जाप करता है|

उस व्यक्ति को सदा के लिए अकाल मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है| इस मृत संजीवनी स्तोत्र की रचना दैत्य गुरु शुक्राचार्य जी के द्वारा युद्ध में मारे गए राक्षसों को पुनर्जीवित करने के लिए की गई थी| मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) को भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र तथा गायत्री मंत्र को मिलाकर बनाया गया था|

Mrit Sanjeevani Stotram

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Mrit Sanjeevani Stotram With Hindi Meaning – मृत संजीवनी स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

|| श्री मृत संजीवनी स्तोत्र ||

एवमारध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयमेश्वरं।
मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा ॥1॥

हिंदी अर्थ – मृत्यु पर विजय पाने वाले, गौरीपति भगवान शंकर की पूजा करने के पश्चात भक्तों को हमेशा मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) का स्पष्ट रूप से पाठ करना चाहिए|

सारात् सारतरं पुण्यं गुह्याद्गुह्यतरं शुभं ।
महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं ॥ 2॥

हिंदी अर्थ – भगवान शंकर का यह कवच जिसे मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) के नाम से जाना जाता है, बहुत ही पवित्र तथा शुभता प्रदान करने वाला है|

समाहितमना भूत्वा शृणुष्व कवचं शुभं ।
शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ॥3॥

हिंदी अर्थ – आचार्य अपने शिष्यों से कहते है – हे वत्स! अपने मन को एकाग्र करके केवल इस मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) का श्रवण करो| यह कवच कल्याणकारी एवं अत्यंत दिव्य है| इसकी गोपनीयता को हमेशा बनाये रखना|

वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवितः ।
मृत्युञ्जयो महादेवः प्राच्यां मां पातु सर्वदा ॥4॥

हिंदी अर्थ – जरा से अभय करने वाले, निरंतर यज्ञ करने वाले तथा सभी देवताओं के द्वारा पूजनीय हे महादेव! आप पार्श्व दिशा से मेरी रक्षा करो|

दधाअनः शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुजः प्रभुः।
सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ॥5॥

हिंदी अर्थ – अभय प्रदान करने वाली महान शक्ति को धारण करने वाले, छ: भुजाओं एवं तीन मुख वाले अग्रि रूपी भगवान शंकर अग्रीकोण में मेरी रक्षा करे|

अष्टदसभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभुः ।
यमरूपि महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ॥6॥

हिंदी अर्थ – अट्ठारह भुजाओं वाले, हाथों में दंड तथा अभय मुद्रा को धारण करने वाले, सर्वत्र व्यापी महादेव शिव दक्षिण दिशा में मेरी सदा रक्षा करें|

खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवितः ।
रक्षोरूपी महेशो मां नैरृत्यां सर्वदावतु ॥7॥

हिंदी अर्थ – हाथों में तलवार तथा अभय मुद्रा धारण करने वाले, राक्षसों के द्वारा आराधित रक्षा रूपी महादेव नैर्ऋत्‍य कोण में मेरी हमेशा रक्षा करें|

पाशाभयभुजः सर्वरत्नाकरनिषेवितः ।
वरुणात्मा महादेवः पश्चिमे मां सदावतु ॥8॥

हिंदी अर्थ – अपने हाथों में पाश धारण करने वाले, सभी रत्नाकरो में सेवित, वरुण स्वरूप भगवान शंकर पश्चिम दिशा में हमेशा मेरी रक्षा करें|

गदाभयकरः प्राणनायकः सर्वदागतिः ।
वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्करः पातु सर्वदा ॥9॥

हिंदी अर्थ – हाथों में गदा धारण करने वाले, प्राणों के रक्षक, हमेशा गतिशील भगवान शिव वायव्यकोण में सदा मेरी रक्षा करें|

शङ्खाभयकरस्थो मां नायकः परमेश्वरः ।
सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्करः प्रभुः ॥10॥

हिंदी अर्थ – हाथों में शंख तथा अभय मुद्रा धारण करने वाले नायक, सर्वव्यापक परमेश्वर महादेव जी समस्त दिशाओं के मध्य मेरी हमेशा रक्षा करें|

शूलाभयकरः सर्वविद्यानमधिनायकः ।
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वरः ॥11॥

हिंदी अर्थ – हाथों में भाला तथा अभय मुद्रा को धारण करने वाले, सभी विद्याओं के स्वामी भगवान शिव ईशान कोण में मेरी हमेशा रक्षा करें|

ऊर्ध्वभागे ब्रःमरूपी विश्वात्माऽधः सदावतु ।
शिरो मे शङ्करः पातु ललाटं चन्द्रशेखरः॥12॥

हिंदी अर्थ – विश्वात्मस्वरूप भगवान शिव मेरे अधोभाग की एवं ब्रह्मरूपी शिव ऊर्ध्वभाग में मेरी हमेशा रक्षा करें| भगवान शंकर मेरे सिर की तथा चंद्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें|

भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु ।
भ्रूयुग्मं गिरिशः पातु कर्णौ पातु महेश्वरः ॥13॥

हिंदी अर्थ – मेरी भौहों के मध्य मध्य सर्वलोकेश तथा दोनों नेत्रों की त्रिनेत्र भगवान शंकर रक्षा करे| मेरे दोनों भौहों की रक्षा गिरीश तथा दोनों कानों की रक्षा भगवान महेश्वर करें|

नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वजः ।
जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ॥14॥

हिंदी अर्थ – भगवान महादेव मेरी नासिका एवं वृषभध्वज मेरे होंठों की हमेशा रक्षा करे| दक्षिणामूर्ति मेरी जिव्हा तथा भगवान गिरीश मेरे दांतों की सदा रक्षा करें|

मृतुय्ञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषणः।
पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ॥15॥

हिंदी अर्थ – मृत्युंजय मेरे मुख की तथा नागभूषण भगवान शंकर मेरे कंठ की हमेशा रक्षा करें| पिनाकी मेरे दोनों हाथों की तथा त्रिशूल धारी भगवान शिव मेरे हृदय की रक्षा करें|

पञ्चवक्त्रः स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वरः ।
नाभिं पातु विरूपाक्षः पार्श्वौ मे पार्वतीपतिः ॥16॥

हिंदी अर्थ – पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनों तथा भगवान जगदीश्वर मेरे उदर की हमेशा रक्षा करें| विरूपाक्ष नाभि की तथा पार्वती पति पार्श्वभाग की रक्षा करें|

कटद्वयं गिरीशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिपः।
गुह्यं महेश्वरः पातु ममोरू पातु भैरवः ॥17॥

हिंदी अर्थ – गिरीश मेरे दोनों कटिभाग की तथा प्रमथाधिप पृष्टभाग की रक्षा करें| महेश्वर मेरे गुह्य भाग तथा भगवान भैरव मेरे दोनों ऊरुओं की रक्षा करें|

जानुनी मे जगद्दर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका ।
पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्यः सदाशिवः ॥18॥

हिंदी अर्थ – जगद्धर्ता मेरे घुटनों की, जगदम्बिका मेरे दोनों जांघों की तथा लोक वंदनीय सदाशिव निरंतर मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें|

गिरिशः पातु मे भार्यां भवः पातु सुतान्मम ।
मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायकः ॥19॥

हिंदी अर्थ – गिरीश मेरे भार्या की तथा भव मेरे संतानों की रक्षा करे| मृत्युंजय मेरे आयु की तथा गणनायक मेरे चित्त की सदा रक्षा करें|

सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकालः सदाशिवः ।
एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम् ॥20॥

हिंदी अर्थ – कालों के काल भगवान शिव हमेशा मेरे सभी अंगों की रक्षा करें| हे वत्स! देवताओं के लिए भी अत्यंत दुर्लभ इस पवित्र कवच का वर्णन मैंने तुमसे किया है|

मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम् ।
सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ॥21॥

हिंदी अर्थ – स्वयं महादेव जी ने ही इस मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) को कहा है| इस स्तोत्र की सहस्त्र आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है|

Mrit Sanjeevani Stotram

यः पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत्सु समाहितः ।
सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ॥22॥

हिंदी अर्थ – जो भी व्यक्ति अपने मन को एकाग्र करके प्रतिदिन इन स्तोत्र का पाठ करता है, सुनता है या दूसरों को सुनाता है| वह व्यक्ति अकाल मृत्यु को जीतकर पूर्ण आयु को प्राप्त करता है|

हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ ।
आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन ॥23॥

हिंदी अर्थ – जो भी व्यक्ति अपने हाथ से मरणासन्न वाले व्यक्ति के शरीर पर स्पर्श करते हुए इस मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) का पाठ करता है, उस मृत प्राणी के भीतर चेतनता आ जाती है|

कालमृयुमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा ।
अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तमः ॥24॥

हिंदी अर्थ – यह मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) काल के हाथ में गए व्यक्ति को भी जीवन प्रदान कर सकता है| वह अणिमा आदि गुणों से युक्त ऐश्वर्य को भी प्राप्त करता है|

युद्दारम्भे पठित्वेदमष्टाविशतिवारकं ।
युद्दमध्ये स्थितः शत्रुः सद्यः सर्वैर्न दृश्यते ॥25॥

हिंदी अर्थ – युद्ध के प्रारंभ होने से पूर्व ही जो भी इस स्तोत्र का 28 बार पाठ करता है| वह उस समय शत्रुओं से अदृश्य हो जाता है|

न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै ।
विजयं लभते देवयुद्दमध्येऽपि सर्वदा ॥26॥

हिंदी अर्थ – यदि युद्ध देवताओं के खिलाफ हो तो ब्रह्मास्त्र भी उसे किसी प्रकार की हानि नहीं पंहुचा सकता है| वह विजय को प्राप्त करता है|

प्रातरूत्थाय सततं यः पठेत्कवचं शुभं ।
अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च ॥27॥

हिंदी अर्थ – जो भी भक्त प्रतिदिन सुबह उठकर इस मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) का पाठ करता है तो उस भक्त को इस लोक तथा परलोक में भी अक्षय्य सुख की प्राप्ति होती है|

सर्वव्याधिविनिर्मृक्तः सर्वरोगविवर्जितः ।
अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिकः ॥28॥

हिंदी अर्थ – वह सम्पूर्ण व्याधियों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है तथा सभी रोग उसके शरीर को त्यागकर चले जाते है| वह अजर – अमर होकर पुनः सोलह वर्ष का व्यक्ति बन जाता है|

विचरव्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान् ।
तस्मादिदं महागोप्यं कवचम् समुदाहृतम् ॥29॥

हिंदी अर्थ – वह इस लोक के दुर्लभ भोगों को प्राप्त करता हुआ सम्पूर्ण लोकों में विचरण करता रहता है| इसी कारण से इस महागोपनीय कवच को मृत संजीवनी के नाम से जाना जाता है|

मृतसञ्जीवनं नाम्ना देवतैरपि दुर्लभम् ॥30॥

हिंदी अर्थ – यह देवताओं के लिए दुर्लभ है|

Table Of Content

Frequently Asked Questions

मृत संजीवनी स्तोत्रम किस भगवान को समर्पित किया गया है?

यह स्तोत्र देवो के देव महादेव अर्थात भगवान शिव को समर्पित किया गया है|

इस स्तोत्र की रचना किसने तथा क्यों की?

इस मृत संजीवनी स्तोत्र की रचना दैत्य गुरु शुक्राचार्य जी के द्वारा युद्ध में मारे गए राक्षसों को पुनर्जीवित करने के लिए की गई थी| मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) को भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र तथा गायत्री मंत्र को मिलाकर बनाया गया था|

मृतसंजीवनी कवच का पाठ करने से क्या लाभ होता है?

जो भी व्यक्ति भगवान शिव की पूजा करते समय इस मृत संजीवनी स्तोत्र का जाप करता है| उस व्यक्ति को सदा के लिए अकाल मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है|

इस मृत संजीवनी स्तोत्र का क्या अर्थ है?

मृत संजीवनी स्तोत्र का अर्थ - मृत्यु से मुक्ति का कवच होता है|


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