Book A Pandit At Your Doorstep For Marriage Puja Book Now

Bhagavad Gita Chapter 11: भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय अर्थ सहित

99Pandit Ji
Last Updated:January 5, 2024

Book a pandit for Bhagavad Gita Path in a single click

Verified Pandit For Puja At Your Doorstep

99Pandit
Table Of Content

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 11) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 11) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय

इसके आलवा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे सत्यनारायण पूजा (Satyanarayan Puja), विवाह पूजा (Marriage Puja), तथा ऑफिस उद्घाटन पूजा (Office Opening Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है| इसी के साथ हमसे जुड़ने के लिए आप हमारे Whatsapp पर भी हमसे संपर्क कर सकते है|

Chapter 11 – विश्वरूप दर्शन योग (Vishwarup Darshan Yoga)


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (1 – 2)

अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन अर्थात् उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया| क्योंकि हे कमलनेत्र ! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तार पूर्वक सुने है तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है|

English Meaning – Arjun said – In order to show your favour to me, the most secret spiritual words i.e. advice that you gave me, my ignorance was destroyed. Because O lotus eye! I have heard from you in detail the origin and destruction of ghosts and have also heard about your imperishable glory.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (3 – 4)

एवमेतद्यथात्थ त्वमा त्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥

हिंदी अर्थ – हे परमेश्वर ! आप अपने को जैसा कहते है, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम ! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य – रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ| हे प्रभो ! यदि मेरे द्वारा आपका वह देखा जाना शक्य है – ऐसा आप मानते है तो हे योगेश्वर ! उस अविनाशी स्वरुप का मुझे दर्शन कराइए|

English Meaning – O God! It is exactly as you call yourself, but oh great man! I want to see firsthand your opulent form consisting of knowledge, opulence, power, strength, semen and brilliance. Oh, Lord! If it is possible for you to be seen by me – do you believe so then oh Yogeshwar! Show me that imperishable form.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (5 – 6)

श्रीभगवानुवाच पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रा नश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – हे पार्थ ! अब तू मेरे सैकड़ो – हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृतिवाले आलौकिक रूपों को देख| हे भरतवंशी अर्जुन ! तू मुझमे आदित्यों को अर्थात् अदिति के द्वादश पुत्रो को, आठ वसुओं को, एकादश रुद्रों को, दोनों अश्विनीकुमारों को और उनचास मरुद्गणों को देख तथा और भी बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख|

English Meaning – Shri Bhagwan said – O Partha! Now you see my hundreds and thousands of different types of supernatural forms with different colours and different shapes. O Arjun of Bharatvanshi! You see in me the Adityas, that is, the twelve sons of Aditi, the eight Vasus, the eleven Rudras, the two Ashvinikumars and the forty-nine Marudganas and many more wonderful forms not seen before.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (7 – 8)

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद् द्रष्टुमिच्छसि ॥
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! अब इस शरीर में एक जगह स्थित चराचर सहित सम्पूर्ण जगत को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख| परन्तु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने नि:संदेह समर्थ नही है, इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात् आलौकिक चक्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख|

English Meaning – Hey Arjun! Now see the entire world including the pastures located at one place in this body and whatever else you want to see, see it. But you are undoubtedly not capable of seeing me with your natural eyes, that is why I give you divine i.e. supernatural eyes, through this, you can see my divine yoga power.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (9-10- 11)

सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥
अनेकवक्त्रनयनम नेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥

हिंदी अर्थ – संजय बोले – हे राजन ! महायोगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात अर्जुन को परम ऐश्वर्य दिव्यस्वरूप दिखलाया| अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुद दर्शनों वाले, बहुत से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रों को धारण किये हुए और दिव्य गंध का सारे शरीर लेप किये हुए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमारहित और सब ओर मुख किये हुए विराटस्वरुप परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा|

English Meaning – Sanjay said – Hey Rajan! After saying this, Mahayogeshwar and the God who destroys all sins showed Arjun the divine form of ultimate opulence. Having many faces and eyes, having many wonderful visions, having many divine ornaments and wearing many divine weapons and having the whole body coated with divine fragrance, having all kinds of wonders, having no limits and having faces on all sides. Arjun saw the Supreme God in a huge form.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (12 – 13)

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥

हिंदी अर्थ – आकाश में एक हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्व रूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित ही हो| पांडूपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात पृथक – पृथक सम्पूर्ण जगत को देवो के देव श्री कृष्ण भगवान के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा|

English Meaning – The light produced by the simultaneous rising of a thousand suns in the sky can hardly be similar to the light of that universal form of God. At that time, Pandu’s son Arjun saw the entire world, divided in many ways, situated in one place in the body of Lord Krishna, the God of Gods.

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (14 – 15)

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥

हिंदी अर्थ – उसके अनंतर आश्चर्य से चकित और पुलकित शरीर अर्जुन प्रकाशमय विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा – भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले| अर्जुन बोले – हे देव ! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पो को देखता हूँ|

English Meaning – After that, Arjun, who was astonished and thrilled with his body, bowed with his head to God in the form of light and with devotion, he said with folded hands. Arjun said – Oh God! I see in your body all the gods and many communities of ghosts, Brahma seated on the lotus seat, Mahadev and all the sages and the divine serpents.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (16 – 17)

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥

हिंदी अर्थ – हे सम्पूर्ण के स्वामी ! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनंत रूपों वाला देखता हूँ| हे विश्वरूप ! मैं आपके न अंत को देखता हूँ, न मध्य को और न आदि को ही| आपको मैं मुकुटयुक्त, गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओर प्रकाशमान तेज के पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेयस्वरुप देखता हूँ|

English Meaning – O Lord of the whole! I see you having many arms, stomach, mouth and eyes and having infinite forms from all sides. O world form! I see neither your end, nor your middle, nor your beginning. I see you crowned, armed with a mace and discus, a beam of light shining all around, glowing with fire and light like the sun, difficult to see and inexplicable from all sides.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (18 – 19)

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥

हिंदी अर्थ – आप ही जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा है| आप ही इस जगत के परम आश्रय है, आप ही अनादि धर्म के रक्षक है और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष है| ऐसा मेरा मत है| आपको आदि, अंत और मध्य से रहित, अनंत सामर्थ्य से युक्त, अनंत भुजा वाले, चन्द्र-सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्निरूप मुखवाले और अपने तेज से इस जगत को संतृप्त करते हुए देखता हूँ|

English Meaning – You are the only one worth knowing, i.e. Parabrahma Paramatma. You are the ultimate shelter of this world, you are the protector of the eternal religion and you are the indestructible eternal man. This is my opinion. I see you without beginning, end and middle, having infinite power, having infinite arms, having eyes like the moon and sun, having a mouth like blazing fire and saturating this world with your brilliance.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (20 – 21)

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥
अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥

हिंदी अर्थ – हे महात्मन् ! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएं एक आपसे ही परिपूर्ण है तथा आपके इस आलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अतिव्यथा को प्राप्त हो रहे है| वे ही देवताओं के समूह आप में प्रवेश करते है और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते है तथा महर्षि और सिद्धों के समुदाय ‘कल्याण हो’ ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्त्रोतों द्वारा आपकी स्तुति करते है|

English Meaning – Oh great man! The entire sky between heaven and earth and all the directions are filled with you and seeing this supernatural and terrible form of yours, all the three worlds are in great pain. The same group of deities enter into you and some with fear, with folded hands, chant your name and qualities and the community of Maharshi and Siddhas praise you with the best sources saying ‘May you be well.’


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (22 – 23)

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥

हिंदी अर्थ – जो ग्यारह रूद्र और बारह आदित्य तथा आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण और पितरों का समुदाय तथा गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय है – वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते है| हे महाबाहो ! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुत हाथ, जंघा और पैरों वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत – सी दाढ़ों के कारण अत्यंत विकराल महान रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे है तथा मैं भी व्याकुल हो रहे है तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ|

English Meaning – The eleven Rudras and the twelve Adityas and the eight Vasus, the Sadhyaganas, the Vishwadevs, the Ashvinikumars and the Marudganas and the community of ancestors and the community of Gandharvas, Yakshas, Rakshasas and Siddhas – they all look at you with astonishment. Oh, great arms! Everyone is getting distressed after seeing your great form with many faces and eyes, many arms, thighs and legs, many stomachs and many molars, and I too am getting distressed.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (24 – 25)

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥

हिंदी अर्थ – क्योंकि हे विष्णो ! आकाश को स्पर्श करने वाले, दैदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अंत:करण वाला मैं धीरज और शांति नही पाता हूँ| दाढो के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखो को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ| इसलिए हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न हो|

English Meaning – Because O Vishno! Seeing you touching the sky, resplendent, multi-coloured, with an outstretched mouth and huge shining eyes, I, with a fearful heart, do not find patience and peace. Looking at your faces which are huge due to beards and burning like the fire of doomsday, I do not know the directions and do not get happiness either. That’s why O Devesh! Oh Jagannivas! You are happy.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (26 – 27)

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥

हिंदी अर्थ – वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश कर रहे है और भीष्म पितामह. द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्ष के प्रधान योद्धाओं के सहित सबके सब आपके दाढो के कारण विकराल भयानक मुखों में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे है और कई एक चूर्ण हुए सिरों सहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दिख रहे है|

English Meaning – All of them are entering you including the community of kings, sons of Dhritarashtra and Bhishma Pitamah. All of them, including Dronacharya, Karna and the chief warriors of our side, are running with great speed into the monstrous, terrifying mouths because of your beards, and many of them are seen with their powdered heads stuck between your teeth.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (28 – 29)

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥

हिंदी अर्थ – जैसे नदियों के बहुत – से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुन्द्र के ही सम्मुख दौड़ते है अर्थात् समुद्र में प्रवेश करते है, वैसे ही वे नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे है| जैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते है, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे है|

English Meaning – Just as the water flows of many rivers naturally run towards the sea, i.e. enter the sea, in the same way, those heroes of the world are also entering your blazing mouths. Just as kites run with great speed into the blazing fire to get destroyed out of attachment, similarly all these people are also running with great speed into your mouth to get destroyed.

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (30 – 31)

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥

हिंदी अर्थ – आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखो द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे है| हे विष्णो ! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत को तेज द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है| मुझ बतलाइए कि आप उग्ररूप वाले कौन है? हे देवो में श्रेष्ठ ! आपको नमस्कार हो| आप प्रसन्न होइए| आदि पुरुष मैं आपको विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता|

English Meaning – You are devouring those entire worlds with your flaming mouths and licking them again and again from all sides. Hey Vishno! Your fiery light is warming the entire world by filling it with radiance. Tell me, who are you in fierce form? O best among gods! Greetings to you. You be happy. Aadi Purusha I want to know you especially because I don’t know your nature.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (32 – 33)

श्रीभगवानुवाच कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ| इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत हुआ हूँ| इसलिए जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग है, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जाएगा| अतएव तू उठ ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से संपन्न राज्य को भोग| ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए है| हे साव्यसचिन ! तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा|

English Meaning – Shri Bhagwan said – I am the increased Mahakaal who destroys the worlds. At this time I am inclined to destroy these worlds. Therefore, all the warriors in the opponent’s army will not survive even without you, that is, even if you do not fight, they will all be destroyed. So you get up! After gaining fame and conquering the enemies, enjoy a kingdom rich in wealth. All these warriors have already been killed by me. Hey Savyaschin! You just become an instrument.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (34 – 35)

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥
सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥

हिंदी अर्थ – द्रोणाचार्य तथा भीष्म पितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार| भय मत कर| नि:संदेह तू युद्ध में वैरियों को जीतेगा| इसलिए युद्ध कर| संजय बोले – केशव भगवान के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर कांपते हुए नमस्कार करके, फिर भी अत्यंत भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गदगद वाणी से बोले|

English Meaning – You kill Dronacharya, Bhishma Pitamah, Jayadratha, Karna and many other brave warriors killed by me. Don’t be afraid. Undoubtedly you will win over your enemies in the war. Therefore wage war. Sanjay said – Hearing these words of Lord Keshav, the crowned Arjuna bowed with folded hands and trembled, and yet being extremely frightened, he bowed to Lord Shri Krishna in an exultant voice.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (36 – 37)

अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – हे अन्तर्यामिन ! यह योग्य ही है कि आपके नाम, गुण, और प्रभाव के कीर्तन से जगत अति हर्षित हो रहा है और अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षस लोग दिशाओं में भाग रहे है और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार कर रहे है| हे महात्मन ! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त ! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! जो सत, असत और इनसे परे अक्षर अर्थात् सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही है|

English Meaning – Arjun said – O Antaryamin! It is worthy that by chanting your name, qualities and influence the world is becoming very happy and is also receiving love and the frightened demons are running in different directions and all the communities of Siddhaganas are saluting. Hey Mahatman! How can they not pay obeisance to you, the creator of Brahma and the greatest of all, because oh infinite! Hey Devesh! Oh Jagannivas! You are the one who is true, false and beyond these Akshar i.e. Sachchidanandaghan Brahma.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (38 – 39)

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥

हिंदी अर्थ – आप आदिदेव और सनातन पुरुष है, आप इन जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम है| हे अनन्तरूप ! आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात् परिपूर्ण है| आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चंद्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के पिता है| आपके लिए हजारों बार नमस्कार ! नमस्कार हो !! आपके लिए फिर भी बार-बार नमस्कार ! नमस्कार !!

English Meaning – You are the Adidev and the eternal man, you are the supreme shelter and knower of this world, knowable and supreme abode. O infinite form! This whole world is filled with you i.e. it is complete. You are the lord of Vayu, Yamraj, Agni, Varun, Moon, people and father of Brahma. Hello to you a thousand times! Hello!! Hail again and again for you! Hello !!


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (40-41- 42)

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥

हिंदी अर्थ – हे अनन्त सामर्थ्यवाले ! आपके लिए आगे से और पीछे से भी नमस्कार ! हे सर्वात्मन ! आपके लिए सब ओर से ही नमस्कार हो, क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किये हुए है, इससे आप ही सर्वरूप है| आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा है ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने ‘हे कृष्ण !’, ‘हे यादव !’, ‘हे सखे !’ इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात्‌ कहा है और हे अच्युत ! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिए विहार, शैय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किये गए है – वह सब अपराध अप्रमेयस्वरुप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ|

English Meaning – O one of infinite power! Greetings to you from front and back too! Oh all-soul! Let there be salutations to you from all sides, because you, the infinite mighty one, pervades the entire world, hence you are the only form of everything. Without knowing about your influence, considering that you are my friend, out of love or even out of carelessness, I have said ‘O Krishna!’, ‘O Yadav!’, ‘O friend!’ thus without thinking and without thinking, O Achyuta! For the sake of humor, you have been insulted by me while walking, in bed, sitting, eating etc., alone or even in front of those friends – I forgive you for all those crimes which are immeasurable i.e. having unimaginable effect.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (43 – 44)

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥

हिंदी अर्थ – आप इस चराचर जगत के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय है| हे अनुपम प्रभाववाले ! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है| अतएव हे प्रभो ! मैं शरीर को भलीभांति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिए प्रार्थना करता हूँ| हे देव ! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते है – वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य है|

English Meaning – You are the father of this living world and the greatest mentor and most worshipable. O one of unique influence! There is no one else like you in the three worlds, then how can there be more. Therefore O Lord! I offer my body a proper prayer at your feet, pay obeisance to you and pray to God who is worthy of praise. Hey, God ! Just like a father tolerates the transgressions of his son, like a friend of a friend and like a husband bears the transgressions of his beloved wife – in the same way you too are capable of tolerating my transgressions.

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (45 – 46)

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥

हिंदी अर्थ – मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुझे दिखलाइए| हे देवेश ! हे जगन्निवास ! प्रसन्न होइए| मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किये हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ| इसलिए हे विश्वरूप ! हे सहस्त्रबाहों ! आप उसी चतुर्भुज से प्रकार होइए|

English Meaning – I am happy to see this wondrous form of yours which I have not seen before and my mind is also very disturbed with fear, so please show me that four-armed Vishnu form of yours. Hey Devesh! Oh Jagannivas! Be happy. I want to see you wearing a crown and holding a mace and discus in your hands. That’s why O world form! O thousand arms! You are like that quadrilateral.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (47 – 48)

श्रीभगवानुवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – हे अर्जुन ! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरे परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराट रूप तुझको दिखाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दुसरे किसी ने पहले नहीं देखा था| हे अर्जुन ! मनुष्य लोक में इस प्रकार विश्व रूप वाला मैं न वेद और यज्ञों के अध्ययन से, न दान, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से ही तेरे अतिरिक्त दुसरे द्वारा देखा जा सकता हूँ|

English Meaning – Shri Bhagwan said – O Arjun! By my grace, with the influence of my power of yoga, I have shown you this most glorious, primal and limitless, vast form of mine, which no one else had seen before except you. Hey Arjun! In the human world, I, having the universal form, cannot be seen by anyone other than you, neither by the study of Vedas and Yagyas, nor by charity, nor by activities, nor by intense penances.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (49 – 50)

मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥
सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥

हिंदी अर्थ – मेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिए और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिए| तू भयरहित और प्रीतियुक्त मनवाला होकर उसी मेरे इस शंख – चक्र – गदा – पद्मयुक्त चतुर्भुज रूप को फिर देख| संजय बोले – वासुदेव भगवान ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखाया और फिर महात्मा श्रीकृष्ण ने सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुन को धीरज दिया|

English Meaning – Seeing such a monstrous form of mine, you should not be disturbed nor should you feel foolish. You, being fearless and having a loving mind, look again at this four-armed form of mine with conch, disc, mace and lotus. Sanjay said – After saying this to Arjun, Lord Vasudev again showed his four-armed form in the same way and then Mahatma Shri Krishna, being the embodiment of gentleness, gave patience to this frightened Arjun.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (51 – 52)

अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥
श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – हे जनार्दन ! आपके इस अतिशांत मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ| श्री भगवान बोले – मेरा जो चतुर्भुज रूप तुमने देखा है, वह सुदुर्दश है अर्थात् इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ है| देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते है|

English Meaning – Arjun said – O Janardan! Seeing this very peaceful human form of yours, I have now become stable and have attained my natural state. Shri Bhagwan said – The four-armed form of mine that you have seen is Sudurdash, that is, its sighting is very rare. Even the gods always aspire to see this form.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (53 – 54)

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥

हिंदी अर्थ – जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है – इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जा सकता हूँ| परन्तु हे परंतप अर्जुन ! अनन्य भक्ति के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए, तत्व से जानने के लिए तथा प्रवेश करने के लिए अर्थात एकीभाव से प्राप्त होने के लिए भी शक्य हूँ|

English Meaning – The way you have seen me – in this way I, having the four-armed form, can be seen neither through the Vedas, nor through penance, nor through charity, nor through yagya. But oh great Arjun! In this way, through undivided devotion, I am capable of seeing the four-armed form directly, knowing it from the elements and also being able to enter into it, that is, to attain it through unity.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (55)

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है (सर्वत्र भगवद्बुद्धि हो जाने से उस पुरुष का अति अपराध करने वाले में भी वैरभाव नहीं होता है, फिर औरों में तो कहना ही क्या है), वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है|

English Meaning – Hey Arjun! The man who performs all his duties only for Me, is devoted to Me, is My devotee, is free from attachment and is free from enmity towards all living beings (having God-consciousness everywhere, that man does not have enmity even among those who commit extreme crimes). Then what is there to say about others), only I get that man with unalloyed devotion.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय समाप्त

99Pandit

100% FREE CALL TO DECIDE DATE(MUHURAT)

99Pandit
Book A Pandit
Book A Astrologer