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Bhagavad Gita Chapter 12: भगवद गीता बारहवां अध्याय अर्थ सहित

99Pandit Ji
Last Updated:January 6, 2024

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क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता बारहवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 12) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता बारहवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 12) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता बारहवां अध्याय

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Chapter 12 – भक्ति योग (Bhakti Yoga)


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (1 – 2)

अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्ता स्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥
श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरंतर आपके भजन – ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दुसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अतिश्रेष्ठ भाव से भजते है – उन दोनों प्रकार के उपासको में अति उत्तम योग्वेत्ता कौन है? श्री भगवान बोले – मुझमे मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन – ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते है, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य है|

English Meaning – Arjun said – Those devoted loving devotees who are continuously engaged in your worship and meditation in the manner mentioned above and those who worship only the imperishable Sachchidanandaghan formless Brahma with great devotion, who is the best Yogvetta among those two types of devotees? Shri Bhagwan said – Those devotees who concentrate their mind on me and are continuously engaged in my bhajans and meditations, with great faith and worship me in the form of God, I consider them to be the best yogis among the yogis.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (3 – 4)

ये त्वक्षरमनिर्देश्यम व्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥

हिंदी अर्थ – परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरुप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकर, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरंतर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते है, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और समान भाव वाले योगी मुझको ही प्राप्त होते है|

English Meaning – But those men who, having well controlled the community of senses, worship Brahma, who is beyond the mind and intellect, omnipresent, unspeakable and always constant, eternal, immovable, formless, imperishable, Sachchidanandaghan Brahma, with constant concentration, they attain complete perfection. Only those yogis who are interested in the welfare of ghosts and have equal feelings are found by me.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (5 – 6)

क्लेशोऽधिकतरस्तेषा मव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गति र्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥

हिंदी अर्थ – उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है| परन्तु जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमे अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरंतर चिंतन करते हुए भजते है|

English Meaning – Those people whose minds are attached to that Sachchidanandaghan formless Brahman achieve unmanifested movement with pain because they are conscious of the body. But those devotees who remain devoted to me, offer all their deeds to me and worship only God in the form of me, continuously thinking about me with exclusive devotion.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (7 – 8)

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! उन मुझमे चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ| मुझमे मन को लगा और मुझमे ही बुद्धि को लगा, इसके उपरांत तू मुझमे ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है|

English Meaning – Hey Arjun! I will soon save those loving devotees who concentrate on me from the world and ocean of death. The mind felt in me and the intellect felt in me, after this, you will reside in me only, there is no doubt in this.

भगवद गीता बारहवां अध्याय

भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (9 – 10)

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥

हिंदी अर्थ – यदि तू मन को मुझमे अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, तो है अर्जुन ! अभ्यासरूप (भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्र्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ भगवत्प्राप्ति के लिए बारंबार करने का नाम ‘अभ्यास’ है) योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर| यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण हो जा| इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा|

English Meaning – If you are not capable of making your mind stable in me, then you are Arjun! In the form of practice (listening to the name and qualities of God, chanting kirtan, meditation and chanting through breathing and reading the scriptures related to attaining God, etc., the name of making the efforts to attain God repeatedly is called ‘abhyas’) wish to attain me through yoga. If you are unable to even do the above-mentioned exercises, then become devoted to doing work only for me. In this way, while doing deeds for my sake, you will only attain my attainment in the form of Siddhi.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (11 – 12)

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज् ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस् त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥

हिंदी अर्थ – यदि मेरी प्राप्ति योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में असमर्थ हूँ, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग कर| मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरुप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शांति होती है|

English Meaning – If I am unable to do the above-mentioned means by relying on Yoga for my attainment, then become one who has victory over the mind, intellect etc. and give up the fruits of all the deeds. Knowledge is better than practice done without knowing the essence, meditation in the form of I, the Supreme Lord, is better than knowledge and renunciation of the fruits of all actions is better than meditation because renunciation immediately brings ultimate peace.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (13 – 14)

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष सब भूतों में द्वेष भाव से रहित, स्वार्थ रहित सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है तथा जो योगी निरंतर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए है और मुझमे दृढ निश्चय वाला है – वह मुझमे अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है|

English Meaning – The man who is free from malice among all beings, selfless, loving to all and kind without any motive, free from affection, free from ego, equal in happiness and sorrow and forgiving, that is, he is the one who gives fearlessness even to the one who commits crime and who The yogi is constantly satisfied, has controlled the body along with the mind and senses and has firm resolve in me – that devotee of mine with his mind and intellect surrendered to me is dear to me.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (15 – 16)

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥

हिंदी अर्थ – जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव के उद्वेग को प्राप्त नहीं होता तथा जो हर्ष, (दुसरे व्यक्ति की उन्नति को देखकर संताप होने का नाम ‘अमर्ष’ है), भय और उद्वेगादि से रहित है वह भक्त मुझको प्रिय है| जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध, चतुर, पक्षपात से रहित और दुखों से छुटा हुआ है – वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है|

English Meaning – The devotee who does not cause any living being to get agitated and who himself does not get agitated by any living being and who is free from joy, (the name of being sad after seeing the progress of another person is ‘Amarsha’), fear and anxiety etc. is that devotee. I love him. The man who is free from desires, pure inside and out, intelligent, free from prejudice and free from sorrows – that devotee of mine who has renounced all beginnings is dear to me.

भगवद गीता बारहवां अध्याय

भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (17 – 18)

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥

हिंदी अर्थ – जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है – वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है| जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी, गर्मी और सुख-दुखादि द्वंद्वो में सम है और आसक्ति से रहित है|

English Meaning – One who never rejoices, never hates, never mourns, never desires and who renounces all actions, auspicious and inauspicious – that man of devotion is dear to me. Who is equal between enemy and friend, honour and insult and is equal in the dualities of cold, heat and happiness and sorrow and is free from attachment.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (19 – 20)

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमति र्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥

हिंदी अर्थ – जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है – वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है| परन्तु जो श्रद्धायुक्त (वेद, शास्त्र, महात्मा और गुरुजनों के तथा परमेश्वर के वचनों में प्रत्यक्ष के सदृश विश्वास का नाम ‘श्रद्धा’ है) पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते है, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय है|

English Meaning – The one who considers praise and criticism equally, is contemplative and is always satisfied with the way his body is maintained and is free from affection and attachment to the place of his residence – that man with a stable intellect and devotion is dear to me. But those devotees who are devoted to me and consume the sacred nectar mentioned above with selfless love (the name of faith is ‘Shraddha’) as per the faith in the Vedas, Shastras, Mahatmas and Mentors and in the direct words of God, those devotees consider me extremely great. They are exceedingly dear to me.


भगवद गीता बारहवां अध्याय समाप्त

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