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Bhagavad Gita Chapter 9: भगवद गीता नवां अध्याय अर्थ सहित

99Pandit Ji
Last Updated:January 2, 2024

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क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता नवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 9) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता नवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 9) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता नवां अध्याय

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Chapter 9 – राज विद्याराज गुह्यः योग (Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga)


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (1 – 2)

श्रीभगवानुवाच इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥

हिंदी अर्थ – श्रीभगवान बोले – तुझ दोषदृष्टिरहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को पुनः भली भांति कहूँगा, जिसको जानकर तू दुःखरूप संसार से मुक्त हो जाएगा| यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनियों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है|

English Meaning – Shri Bhagavan said – I will once again explain this knowledge along with this highly confidential science to you, a devotee without any faults, knowing which you will be freed from the world of sorrow. This knowledge including science is the king of all knowledge, the king of all secrets, very pure, very good, bearing visible results, full of religion, very easy to use and indestructible.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (3 – 4)

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥

हिंदी अर्थ – हे परंतप ! इस उपयुक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्यु रूप संसार चक्र में भ्रमण करते रहते है| मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित है, किन्तु वास्तव में मैं उनमे स्थित नहीं हूँ|

English Meaning – Hey Parantap! People without faith in this appropriate religion, without attaining Me, keep roaming in the world cycle in the form of death. This entire world is filled with water and ice like the formless God and all the ghosts are situated within me on the basis of will, but in reality, I am not present in them.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (5 – 6)

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥

हिंदी अर्थ – वे सब भूत मुझमे स्थित नहीं है, किन्तु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण – पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है| जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान वायु सदा आकाश में ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से सम्पूर्ण भूत मुझमे स्थित है, ऐसा जान |

English Meaning – All those ghosts are not present in me, but looking at my divine power of yoga, my soul, which sustains and nurtures the ghosts and also creates the ghosts, is not actually present in the ghosts. Just as the great wind which spreads everywhere arising from the sky is always situated in the sky, in the same way, the entire existence is situated in me due to its origin from my will, know this.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (7 – 8)

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नम वशं प्रकृतेर्वशात् ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! कल्पों के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते है अर्थात प्रकृति में लीन होते है और कल्पो के आदि में उनको मैं पुनः रचता हूँ| अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस सम्पूर्ण भूतसमुदाय को बार – बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ|

English Meaning – Hey Arjun! At the end of the Kalpa, all the ghosts attain my nature, that is, they merge into nature and I create them again at the beginning of the Kalpa. By accepting my nature and becoming dependent on the power of nature, I create this entire community of ghosts again and again according to their deeds.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (9 – 10)

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश (जिसके संपूर्ण कार्य कर्तत्व भाव के बिना अपने आप सत्ता मात्र ही होते है उसका नाम ‘उदासीन के सदृश है|’) स्थति मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बांधते| हे अर्जुन ! मुझ अधिष्ठाता के सकाश से प्रकृति चराचर सहित सर्वजगत को रचती है और इस हेतु से ही यह संसारचक्र घूम रहा है|

English Meaning – Hey Arjun! Those actions do not bind me, the Supreme Soul, who is free from attachment and is like an indifferent person (whose entire actions are mere existence on their own, without the feeling of being a doer, his name is like ‘like an indifferent one’). Hey Arjun! With the power of my presence, nature creates the universe along with its creatures and it is for this reason that this world cycle is rotating.

भगवद गीता नवां अध्याय

भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (11 – 12)

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥

हिंदी अर्थ – मेरे परमभाव को न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ संपूर्ण भूतों के महान ईश्वर को तुच्छ समझते है अर्थात अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिए मनुष्य रूप में विचरते हुए मुझ परमेश्वर को साधारण मनुष्य जानते है| वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किए रहते है|

English Meaning – The foolish people, who do not know My Supreme Being, consider Me to be the great God of all the ghosts who have assumed a human body, that is, ordinary people consider Me to be the Supreme God who wanders in human form for the salvation of the world through His Yoga Maya. Those confused-minded ignorant people with useless hopes, useless actions and useless knowledge continue to possess demonic, demonic and Mohini nature.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (13 – 14)

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥

हिंदी अर्थ – परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्माजन मुझको सब भूतों का सनातन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरुप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरंतर भजते है| वे दृढ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझको बार बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते है|

English Meaning – But O son of Kunti! Mahatma who are dependent on the divine nature, considering me to be the eternal cause of all existences and the immortal form of the form, worship me continuously with a dedicated mind. Those strong-willed devotees, constantly chanting My name and qualities, making efforts to attain Me, and paying obeisance to Me again and again, always concentrate on Me and worship Me with infinite love.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (15 – 16)

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यम हमग्निरहं हुतम् ॥

हिंदी अर्थ – दुसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण – निराकार ब्रह्म का ज्ञानयज्ञ द्वारा अभिन्नभाव से पूजन करते हुए भी मेरी उपासना करते है और दुसरे मनुष्य बहुत प्रकार से स्थित मुझ विराट स्वरुप परमेश्वर की पृथक भाव से उपासना करते है| क्रतु मैं हूँ , यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूँ|

English Meaning – Other Gyan Yogis worship Me, the formless Brahma, in an integral sense, through the Gyan Yagya, and other human beings worship Me, the Supreme Being, the vast form situated in many ways, in a separate sense. I am Kratu, I am Yagya, I am Swadha, I am medicine, I am mantra, I am ghee, I am fire and I am also the ritual of Havan.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (17 – 18)

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥

हिंदी अर्थ – इस सम्पूर्ण जगत का धाता अर्थात धारण करने वाला एवं कर्मों के फल को देने वाला, पिता, माता, पितामह, जानने योग्य, पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ| प्राप्त होने योग्य परम धाम, भरण – पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति – प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ|

English Meaning – I am the Dhāta of this entire world i.e. the bearer and the giver of the fruits of one’s actions, the father, the mother, the great grandfather, the knowable, the holy Omkar and also I am the Rigveda, Samveda and Yajurveda. The supreme abode attainable, the one who provides sustenance, the master of all, the seer of good and bad, the abode of all, worthy of taking refuge, the one who does good without seeking retribution, the origin of all – the cause of destruction, the basis of the situation, the foundation and also the imperishable cause. I am the one.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (19 – 20)

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥

हिंदी अर्थ – मैं ही सुर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसता हूँ| हे अर्जुन ! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत – असत भी मैं ही हूँ| तीनों वेदों में विधान किये हुए सकाम कर्मो को करने वाले, सोम रस को पीने वाले, पापरहित पुरुष (यहाँ स्वर्ग प्राप्ति के प्रतिबंधक देव ऋणरूप पाप से पवित्र होना समझना चाहिए) मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते है, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलस्वरूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते है|

English Meaning – I am the one who burns like the sun, attracts the rain and makes it rain. Hey Arjun! I am nectar and death and I am also true and false. Those men who perform fruitful actions as prescribed in the three Vedas, drink Soma Rasa, and are sinless (here, the god that hinders the attainment of heaven should be understood as being pure from sin in the form of debt) wish to attain heaven by worshipping me through Yagyas, those men, through their virtues, As a result of this, one reaches heaven and enjoys the pleasures of the divine gods in heaven.

भगवद गीता नवां अध्याय

भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (21 – 22)

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥

हिंदी अर्थ – वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक को प्राप्त होते है| इस प्रकार स्वर्ग के साधन रूप तीनों वेदों में कहे हुए सकामकर्म का आश्रय लेने वाले और भोगों की कामना वाले पुरुष बार – बार आवागमन को प्राप्त होते है, अर्थात पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग में जाते है और पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आते है| जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते है, उन नित्य – निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ|

English Meaning – After enjoying that vast heaven, when their virtues diminish, they reach the world of death. In this way, the people who take refuge in the good deeds as mentioned in the three Vedas as a means to heaven and desire the pleasures, attain repeated transits, that is, due to the influence of virtue, they go to heaven and when their virtue diminishes, they come to the world of death. I myself attain the good fortune of those devoted devotees who constantly think about me and worship me selflessly, who think about me continuously.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (23 – 24)

येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! यद्यपि श्रद्धा से युक्त जो सकाम भक्त दुसरे देवताओं को पूजते है, वे भी मुझको ही पूजते है, किंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात् अज्ञानपूर्वक है| क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ, परन्तु वे मुझ परमेश्वर को तत्त्व से नहीं जानते, इसी से गिरते है अर्थात् पुनर्जन्म को प्राप्त होते है|

English Meaning – Hey Arjun! Although the true devotees with faith who worship other gods, they also worship me, but their worship is unethical i.e. ignorantly. Because I am the enjoyer and master of all the Yagyas, but they do not know Me, the Supreme Lord, in essence, due to this they fall, that is, they are reborn.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (25 – 26)

यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन् यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

हिंदी अर्थ – देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते है, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते है, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते है और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते है| इसलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता| जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र – पुष्पादि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ|

English Meaning – Those who worship the gods attain the gods, those who worship the ancestors attain the ancestors, those who worship the ghosts attain the ghosts and the devotees who worship me attain Me. That is why my devotees are not reborn. Any devotee who lovingly offers me a letter, flower, fruit, water, etc., that letter – Pushpadi – lovingly offered by that pure-minded selfless loving devotee, I appear in my sagun form and eat it with love.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (27 – 28)

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो ताप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर| इस प्रकार, जिसमे समस्त कर्म मुझ भगवान के अर्पण होते है – ऐसे संन्यासयोग से युक्त चित्तवाला तू शुभाशुभ फलस्वरूप कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा और उनसे मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होगा|

English Meaning – Hey Arjun! Whatever work you do, whatever you eat, whatever you perform, whatever you donate and whatever you do, offer it to me. In this way, in which all the deeds are offered to me, God – you, having a mind with such sannyasa yoga, will be freed from the bondage of good and bad deeds and after getting free from them, you will reach me only.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (29 – 30)

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥

हिंदी अर्थ – मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है, परन्तु जो भक्त मुझको प्रेम से भजते है, वे मुझमे है और मैं भी उनमे प्रत्यक्ष (जैसे सूक्ष्म रूप से सब जगह व्यापक हुआ भी अग्नि साधनों द्वारा प्रकट करने से ही प्रत्यक्ष होता है, वैसे ही सब जगह स्थित हुआ भी परमेश्वर भक्ति से भजने वाले के ही अन्तः करण में प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होता है|) यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधू ही मानने योग्य है,क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है| इसका मतलब उसने भली – भांति यह निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है|

English Meaning – I am equally widespread among all the beings, neither is anyone unpleasant nor dear to me, but the devotees who worship me with love are in me and I too am visible in them (just as I am spread everywhere in a subtle form, I am also revealed through the means of fire). It becomes visible only by doing, similarly, God, who is present everywhere, is directly visible in the heart of the one who worships him with devotion.) If even a very evil person becomes my devotee and worships me with full devotion, then he is a saint. It is acceptable because it has true determination. This means that he has firmly decided that there is nothing else like the praises of God.

भगवद गीता नवां अध्याय

भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (31 – 32)

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥

हिंदी अर्थ – वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शांति को प्राप्त होता है| हे अर्जुन ! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता| हे अर्जुन ! स्त्री, वैश्य, शुद्र तथा पापयोनि चांडालादि जो कोई भी हो, वे भी मेरे शरण होकर परमगति को ही प्राप्त होते है|

English Meaning – He soon becomes a righteous soul and attains eternal peace. Hey Arjun! Know the truth with certainty that my devotee never gets destroyed. Hey Arjun! Whoever is a woman, a Vaishya, a Shudra or a sinful person like Chandal, they also attain the ultimate path by taking refuge in me.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (33 – 34)

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥

हिंदी अर्थ – फिर इसमें कहना ही क्या है, जो पुण्यशील ब्राह्मण था राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परमगति को प्राप्त होते है| इसलिए तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर निरंतर मेरा ही भजन कर| मुझमे मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो, मुझको प्रणाम कर| इस प्रकार आत्मा को मुझमे नियुक्त करके मेरे परायण होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा|

English Meaning – Then what is there to say in this, the devotees of Rajarshi who were virtuous Brahmin attain supreme salvation by taking refuge in me. Therefore, after attaining this pleasureless and fleeting human body, worship me continuously. Be one who has my heart in mind, be my devotee, be one who worships me, pay obeisance to me. In this way, by appointing the soul in me and becoming my devotee, you will attain me only.


भगवद गीता नवां अध्याय समाप्त

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