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Bhagavad Gita Chapter 8: भगवद गीता आठवाँ अध्याय अर्थ सहित

99Pandit Ji
Last Updated:December 30, 2023

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क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता आठवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 8) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता आठवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 8) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता आठवाँ अध्याय

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Chapter 8 – अक्षरब्रह्म योग (Akshara Brahma Yoga)


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (1 – 2)

अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन ने कहा – हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते है| हे मधुसूदन ! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते है|

English Meaning – Arjun said – Oh great man! What is that Brahma? What is spirituality? What is Karma? What is said by the name Adhibhuta and who is called Adhidaiva? Hey Madhusudan! Who is Adhiyagya here? And how is he in this body? And how do you come to know in the end time by people with intelligent minds?


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (3 – 4)

श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥

हिंदी अर्थ – श्रीभगवान ने कहा – परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरुप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है| उत्पत्ति – विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत है, हिरण्यमय पुरुष (जिसको शास्त्रों में सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ, ब्रह्मा आदि नामों से कहा गया है) अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अंतर्यामी रूप से अधियज्ञ हूँ|

English Meaning – Shri Bhagwan said – The ultimate letter is ‘Brahm’, our own form i.e. the soul is called ‘Adhyatma’ and the renunciation that gives rise to the feeling of ghosts is called ‘Karma’. All things of the origin-destruction religion are possessed, the Hiranyamaya Purusha (who is called Sutratma, Hiranyagarbha, Brahma etc. in the scriptures) is the Adhidaiva and O Arjuna, the best among bodily beings! In this body, I am Vasudev, who is internally adhiyagya.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (5 – 6)

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरुप को प्राप्त होता है – इसमें कुछ भी संशय नहीं है| हे कुन्ती पुत्र अर्जुन ! यह मनुष्य अन्तकाल में जिस – जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, उस – उसको ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है|

English Meaning – The man who leaves his body remembering Me even in his last days, attains My true form – there is no doubt in this. Oh Arjun, son of Kunti! Whatever feeling this person remembers when he leaves his body in his last moments, he attains it only because he has always been feeling the same.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (7 – 8)

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धि र्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥

हिंदी अर्थ – इसलिए हे अर्जुन ! तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर| इस प्रकार मुझमे अर्पण किये हुए मन – बुद्धि से युक्त होकर तू नि: संदेह मुझको ही प्राप्त होगा| हे पार्थ ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश रूप दिव्य पुरुष को अर्थात परमेश्वर को ही प्राप्त होता है|

English Meaning – Therefore O Arjun! You remember me constantly at all times and also fight. In this way, with your mind and intellect surrendered to me, you will attain me without any doubt. Hey Parth! This is the rule that a person who continuously meditates with the mind engaged in the practice of meditating on God and not going anywhere else attains the Supreme Light in the form of the Divine Purusha i.e. God Himself.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (9 – 10)

कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंता सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण – पोषण करने वाले अचिन्त्य – स्वरुप, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है| वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल बे भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, उसके पश्चात निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है|

English Meaning – The man who remembers the Supreme Lord, who is the omniscient, eternal, controller of all, more subtle than even the subtle, unthinkable form who sustains and nurtures all, ever conscious light form like the sun and far beyond ignorance, pure Sachchidanandaghan God. Even in the last moments of life, that man with devotion, without the power of yoga, by properly establishing his life in the middle of the forehead and then remembering it with a calm mind, attains that divine form of the Supreme Being, the Supreme Soul.

भगवद गीता आठवाँ अध्याय

भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (11 – 12)

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥

हिंदी अर्थ – वेद के जानने वाले विद्वान जिस सच्चिदानन्दघन परम पद को अविनाश कहते है| आसक्ति रहित यत्नशील सन्यासी महात्माजन, जिसमे प्रवेश करते है और जिस परम पद को चाहने वाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य का आचरण करते है, उस परम पद को मैं तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा| सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश्य में स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मन के द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित करके, परमात्म संबंधी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष ‘ॐ’ इस एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह पुरुष गति को प्राप्त होता है|

English Meaning – The scholars who know the Vedas call the supreme position Sachchidanandaghan as indestructible. I will briefly describe for you the supreme state into which the ascetics who strive without attachment enter and the celibates who desire the supreme state practice celibacy. By closing the doors of all the senses and by fixing the mind in the heart, then by establishing the Prana in the head through that winning mind, and being situated in the yoga-dharana of God, the person who pronounces this one-syllable form of Brahma ‘Om’ and his The person who contemplates on me as the formless Brahman and leaves his body, attains the spiritual state.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (13 – 14)

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष ‘ॐ’ इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ अपने शरीर का त्याग करता है, वह मनुष्य सदैव परम गति को प्राप्त होता है| हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझमे अनन्य – चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य – निरंतर मुझमे युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ|

English Meaning – The person who leaves his body while reciting this one syllable Brahma and remembering me, ‘Om’, that person always attains the supreme state. Hey Arjun! I am easily accessible to the yogi who always remembers Me, the Supreme Being, with a constant mind in Me, that is, I can be easily attained by him.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (15 – 16)

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥

हिंदी अर्थ – परम सिद्धि को प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दु:खो के घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होंगे| हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यंत सब लोक पुनरावर्ती है, परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य है|

English Meaning – The great souls who have attained supreme success, after attaining me, will not go to the house of sorrows and fleeting rebirth. Hey Arjun! All the worlds are recurring till Brahmaloka, but oh son of Kunti! There is no rebirth after attaining me because I am timeless and all these are impermanent due to being limited by the worldly time of Brahmadi.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (17 – 18)

सहस्रयुगपर्यन्त महर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥

हिंदी अर्थ – ब्रह्मा का जो एक दिन है, उसको एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला और रात्रि को भी एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला जो पुरुष तत्व से जानते है, वे योगीजन काल के तत्व को जानने वाले है| सम्पूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेश काल में अव्यक्त से अर्थात ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर से उत्पन्न होते है और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त नामक ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर में ही लीन हो जाते है|

English Meaning – Those who know the essence of Brahma’s day, which lasts for one thousand Chaturyugas and the night also lasts for one thousand Chaturyugas, are the Yogis who know the essence of Kaal. All living beings are born from the subtle body of Brahma during the entry of Brahma’s day and merge into the subtle body of Brahma called Avyakt during the entry of Brahma’s night.

भगवद गीता आठवाँ अध्याय

भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (19 – 20)

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥
परस्तस्मात्तु भावोऽन्यो ऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥

हिंदी अर्थ – हे पार्थ ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न होकर प्रकृति वश में हुआ रात्रि के प्रवेश काल में लीन होता है और दिन के प्रवेश काल में फिर उत्पन्न होता है| उस अव्यक्त से भी अति परे दूसरा अर्थात विलक्षण जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह परम दिव्य पुरुष सब भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नही होता|

English Meaning – Hey Parth! This ghost group, after being born under the control of nature, gets absorbed at the time of the entry of night and is born again at the time of the entry of the day. Beyond that unmanifested person, the other i.e. unique eternal unmanifested feeling, that supreme divine man, does not get destroyed even after the destruction of all the ghosts.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (21 – 22)

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस् तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥

हिंदी अर्थ – जो अव्यक्त ‘अक्षर’ इस नाम से कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परमगति कहते है तथा जिस सनातन अव्यक्त भाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस नही आते, वह मेरा परम धाम है| हे पार्थ ! जिस परमात्मा के अंतर्गत सर्वभूत है और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत परिपूर्ण है, वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है|

English Meaning – The unexpressed ‘letter’ which is called by this name, the unexpressed feeling called the same letter is called Paramgati and the eternal unexpressed feeling after attaining which humans do not return, is my supreme abode. Hey Parth! The God under whom everything exists and with whom the entire world is filled with the true God, that eternal unmanifested Supreme Being is attainable only through undivided devotion.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (23 – 24)

यत्र काले त्वनावृत्ति मावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! जिस काल में शरीर त्यागकर गए हुए योगीजन तो वापस न लौटने वाली गति को और जिस काल में गए हुए वापिस लौटने वाली गति को ही प्राप्त होते है, उस काल को अर्थात दोनों मार्गों को कहूँगा| जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि – अभिमानी देवता है, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छ: महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते है|

English Meaning – Hey Arjun! The period in which the yogis who have left their body attain the path of no return and the period in which the departed attain only the path of return, that is, I will call both the paths. On the path in which there is a proud deity of the light of fire, a proud deity of the day, a proud deity of the Shukla Paksha and a proud deity of the six months of Uttarayan, the Brahmaveta yogis who died on that path are taken to Brahma in sequence by the appropriate deities. are received.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (25 – 26)

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः ॥

हिंदी अर्थ – जिस मार्ग धूमाभिमानी देवता है, रात्रि अभिमानी देवता है तथा कृष्ण पक्ष का अभिमानी देवता है और दक्षिणायन के छ: महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गया हुआ सकाम कर्म करने वाला योगी उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले गया हुआ चंद्रमा की ज्योत को प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर वापिस आता है| क्योंकि जगत के ये दो प्रकार के – शुक्ल और कृष्ण अर्थात देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गए है| इनमे एक द्वारा गया हुआ – जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परमगति को प्राप्त होता है और दूसरे के द्वारा गया हुआ पुनः वापस है अर्थात जन्म – मृत्यु को प्राप्त होता है|

English Meaning – On the path in which there is a proud god of smoke, a proud god of night, a proud god of Krishna Paksha and a proud god of the six months of Dakshinayan, the yogi who performed fruitful deeds after dying in that path, is carried by the appropriate deities in order of the light of the moon. After achieving this, he returns to heaven after enjoying the fruits of his good deeds. Because these two types of world – Shukla and Krishna i.e. Devyaan and Pitriyan paths are considered eternal. Among these, one who has gone through one – from which there is no need to return, attains the supreme state and one who has gone through the other one has to return again, that is, one attains birth and death.

भगवद गीता आठवाँ अध्याय

भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (27 – 28)

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत् पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥

हिंदी अर्थ – हे पार्थ ! इस प्रकार इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता| इस कारण हे अर्जुन ! तू सब काल में समबुद्धि रूप से योग से युक्त हो अर्थात निरंतर मेरी प्राप्ति के लिए साधन करने वाला हो| योगी पुरुष इस रहस्य को तत्त्व से जानकर वेदों के पढने में तथा यज्ञ, तप और दानादि के करने में जो पुण्यफल कहा है, उन सबको नि:संदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परम पद को प्राप्त होता है|

English Meaning – Hey Parth! In this way, no yogi gets deluded by knowing these two paths from their essence. For this reason O Arjun! You should be equanimous in yoga at all times, that is, you should be constantly making efforts for my attainment. Knowing this secret from its essence, a yogi person undoubtedly violates all the virtuous results mentioned in reading the Vedas and doing yagya, penance and charity etc. and attains the eternal supreme position.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय समाप्त

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