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Bhagavad Gita Chapter 4: भगवद गीता चतुर्थ अध्याय अर्थ सहित

99Pandit Ji
Last Updated:December 26, 2023

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क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता चतुर्थ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 4) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता चतुर्थ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 4) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय

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Chapter 4 –  ज्ञान कर्मसंन्यास योग (Yoga Of Knowledge and Renunciation from Action)


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (1 – 2)

श्रीभगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥

हिंदी अर्थ – भगवान श्री कृष्णा कहते है – पहले मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा | हे परन्तप अर्जुन ! इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु बहुत काल बीतने के बाद वह योग – परम्परा (पृथ्वी से) लुप्त हो गयी|

English Meaning – Lord Shri Krishna says – Earlier I told this imperishable yoga to Surya, Surya told it to his son Vaivaswat Manu and Manu told it to his son King Ikshvaku. O blessed Arjun! In this way, the royal sages came to know this yoga received from the tradition, but after a long time, that yoga tradition disappeared (from the earth).


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (3 – 4)

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥
अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥

हिंदी अर्थ – वही यह पुरातन योग आज मैंने तुमसे कहा है क्योंकि तुम मेरे भक्त और प्रिय सखा हो| यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है| अर्जुन बोले – आपका जन्म तो अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है तब मैं इस बात को कैसे समझूँ कि आप ने ही (कल्प के) पूर्व में सूर्य से यह योग कहा था?

English Meaning – I have told you this ancient yoga today because you are my devotee and dear friend. This is a very good secret. Arjun said – Your birth is very recent and the birth of the Sun is very old, then how can I understand that you yourself had said this yoga to the Sun in the past (Kalpa)?


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (5 – 6)

श्रीभगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – हे परंतप अर्जुन ! मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके है तुम उन सबकों नहीं जानते, परन्तु मैं जानता हूँ| अजन्मा, अविनाशी और सभी प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी मैं, अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ|

English Meaning – The Lord says – O great Arjun! You and I have had many births, you don’t know them all, but I know. Despite being unborn, indestructible and the God of all living beings, I, after subduing my nature, appear through my Yogamaya.


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (7 – 8)

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

हिंदी अर्थ – हे भारत ! जब – जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब – तब मैं अपने (साकार) रूप को रचता हूँ | साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालो का विनाश करने के लिए और धर्म की यथार्थ करने के लिए मैं युग – युग में प्रकट हुआ करता हूँ|

English Meaning – O Bharat! Whenever there is a loss of righteousness and an increase of unrighteousness, then I create my (real) form. I appear in every age to save the saints, to destroy those who commit sins and to correct the religion.


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (9 – 10)

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! जो मनुष्य मेरे जन्म और कर्म को तत्त्व से दिव्य जान लेता है, वह शरीर त्याग कर फिर जन्म नहीं लेता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है| नष्ट आसक्ति, भय और क्रोध वाले, मुझसे अनन्य प्रेम करने वाले और मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त ज्ञान रूपी तप से पवित्र होकर (पहले भी) मेरे स्वरुप को प्राप्त हो चुके है|

English Meaning – Hey Arjun! The person who considers my birth and actions as divine by essence, does not take birth again after leaving his body, but only attains me. Many devotees who have destroyed attachment, fear and anger, who love me unconditionally and who are dependent on me, have (already) attained my form by becoming pure through penance in the form of knowledge.


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (11 – 12)

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
 काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥

हिंदी अर्थ – जो भक्त मुझे जिस प्रकार से भजते है, मैं भी उनको उसी प्रकार से भजता हूँ| हे अर्जुन ! ऐसे सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते है| इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले देवताओं का पूजन करते है क्योंकि उससे कर्मों द्वारा होने वाली सिद्धि  उनको शीघ्र मिल जाती है|

English Meaning – As my devotees worship me, I also worship them in the same way. Hey Arjun! All such people follow my path in every way. In this human world, those who want the fruits of their deeds worship the gods because through them they get the success achieved through their deeds quickly.


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (13 – 14)

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥

हिंदी अर्थ – चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र) को उनके गुण और कर्मों के विभाग पूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है| उस सृष्टि – रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी को तुम अकर्ता ही जानों | मुझे कर्मों के फल की कामना नहीं है इसलिए कर्म मुझे लिप्त नहीं करते| इस प्रकार जो तत्त्व से मुझे जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बंधता|

English Meaning – The four varnas (Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Shudra) have been created by me with divisions of their qualities and actions. Even though I am the doer of that creation and creation, you should consider me as the imperishable and not the doer. I do not desire the fruits of my actions, therefore actions do not indulge me. In this way, the one who knows me in principle is also not bound by deeds.

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (15 – 16)

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥

हिंदी अर्थ – पहले भी मोक्ष की इच्छा वाले मनुष्यों ने इस प्रकार जानकर ही कर्म किये है इसलिए तुम भी पूर्वजों जैसे ही सदा से किये जाने वाले कर्मों को ही करों | कर्म क्या है? अकर्म क्या है? इसका निर्णय करने में बुद्धिमान भी मोहित हो जाते है| इसलिए मैं तुमसे वह कर्म कहूँगा जिसे जानकर तुम अशुभ (कर्म – बंधन) से मुक्त हो जाते है|

English Meaning – Even in the past, people who desired salvation have done their deeds after knowing this, hence you too should do the same deeds which you have always done like your ancestors. What is Karma? What is non-action? Even intelligent people get tempted to decide this. Therefore, I will tell you that karma, knowing which you become free from inauspicious (karma-bondage).


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (17 – 18)

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥
कर्मण्यकर्म यः पश्येद कर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥

हिंदी अर्थ – कर्म का स्वरुप भी जानना चाहिए और विकर्म का स्वरुप भी जानना चाहिए तथा अकर्म का स्वरुप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्मों की गति गहन है, जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखते है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी सभी कर्मों को करने वाला है|

English Meaning – One should know the nature of karma and one should also know the nature of vice and one should also know the nature of non-action because the speed of actions is deep, the one who sees non-action in action and action in non-action is the wisest among humans and that yogi is able to perform all the actions. is gonna.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (19 – 20)

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥

हिंदी अर्थ – जिसके सभी कर्मों के आरम्भ बिना कामना और संकल्प के होते है और जिसके सभी कर्म ज्ञान रूपी अग्नि द्वारा जल चुके है, उसको ज्ञानी लोग भी पंडित कहते है, जो सभी कर्मों और उनके फल में आसक्ति का त्याग करके स्वयं में नित्य संतुष्ट है और संसार के आश्रय से रहित हो गया है, वह कर्म करता हुआ भी कुछ भी नहीं करता|

English Meaning – The one whose all actions begin without desire and resolution and whose actions have been burnt by the fire of knowledge, the knowledgeable people also call him a Pandit, the one who has given up attachment to all actions and their results and is eternally satisfied with himself and the world. He has become devoid of the shelter of God, he does nothing even while doing work.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (21 – 22)

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥

हिंदी अर्थ – आशारहित, जीते हुए अंत:करण वाला और सभी संग्रहों का त्याग करने वाला मनुष्य केवल शरीर – निर्वाह संबंधी कर्म करता हुआ भी पाप को प्राप्त नहीं होता | जो स्वत: प्राप्त वस्तु से संतुष्ट, द्वंद्वो (हर्ष-शोक आदि) से अतीत, ईर्ष्या रहित और सफलता – असफलता में समान रहने वाला हो, वह कर्मों को करता हुआ भी उनसे नहीं बंधता है|

English Meaning – A person without hope, with a living conscience and renouncing all wealth does not commit sin even while performing activities related only to the subsistence of the body. The one who is satisfied with what he gets automatically, is free from conflicts (joy-sorrow etc.), is free from jealousy and remains equal in success and failure, he is not bound by the deeds even while doing them.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (23 – 24)

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥

हिंदी अर्थ – जिसकी आसक्ति नष्ट हो गई है, जिसका चित्त निरंतर मुक्ति के ज्ञान में स्थित है – केवल यज्ञ संपादन के लिए कर्म करने वाले उस मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते है| जिस यज्ञ में अर्पित पदार्थ भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्म रूपी कर्ता द्वारा ब्रह्म रूपी आहुति रूपी क्रिया भी ब्रह्म है – उस ब्रह्म रूपी कर्म में स्थित रहने वाले के द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही है|

English Meaning – Whose attachment has been destroyed, whose mind is constantly fixed in the knowledge of liberation – the entire karma of that person, who works only for the performance of Yagya, dissolves. In the Yagya the object offered is also Brahma and the substance capable of being sacrificed is also Brahma and the action of the sacrifice in the form of Brahma by the doer in the form of Brahma is also Brahma – the result attainable by the person who remains engaged in that action in the form of Brahma is also Brahma.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (25 – 26)

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥

हिंदी अर्थ – दुसरे मनुष्य देव – उपासना रूपी यज्ञ का ही भली – भांति करते है और अन्य ब्रह्म रूपी अग्नि में (अभेद दर्शन द्वारा आत्म रूपी) यज्ञ का हवन करते है| अन्य योगी श्रोत्र आदि सभी इन्द्रियों का संयम रूपी अग्नियों में हवन करते है और दुसरे योगी शब्दादि सभी विषयों का इन्द्रिय रूपी अग्नियों में हवन करते है|

English Meaning – Other people perform the Yagya in the form of worship of Gods very well and others perform the Yagya in the fire of Brahma (the self in the form of Abheda Darshan). Other yogis offer oblations of all the senses like hearing etc. in the fires of restraint and other yogis offer oblations of all objects like words etc. in the fires of the senses.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (27 – 28)

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥

हिंदी अर्थ – दुसरे योगी इन्द्रियों और प्राणों की सभी क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म – संयम योग की अग्नि में हवन करते है| कुछ मनुष्य द्रव्य से यज्ञ करने वाले है और कुछ तपस्या रूपी यज्ञ करने वाले है तथा दुसरे कितने ही योग समान यज्ञ करने वाले है| कुछ यत्नशील मनुष्य अहिंसादि व्रतों से युक्त स्वाध्याय रूपी ज्ञानयज्ञ करने वाले है|

English Meaning – Other yogis sacrifice all the functions of the senses and the vital force in the fire of self-control yoga illuminated by knowledge. Some human beings are going to perform Yagya using liquid and some are going to perform Yagya in the form of penance and many others are going to perform Yagya similar to Yoga. Some diligent people are going to perform the Yagya of knowledge in the form of self-study along with non-violent vows.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (29 – 30)

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥

हिंदी अर्थ – कुछ योगी अपान वायु में प्राण वायु का हवन करते है और दुसरे प्राण वायु में अपान वायु का हवन करते है| कुछ अन्य प्राणायाम परायण योगी प्राण और अपान की गति को रोककर नियमित आहार द्वारा प्राणों में ही हवन करते है| ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश करने वाले और यज्ञों को जानने वाले है|

English Meaning – Some yogis perform Havan of Prana Vayu in Apana Vayu and others perform Havan of Apana Vayu in Prana Vayu. Some other Yogis practising Pranayam stop the movement of Prana and Apana and perform Havan in Prana through a regular diet. All these seekers are the ones who destroy sins through Yagyas and know about Yagyas.

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (31 – 32)

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥

हिंदी अर्थ – हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगी सनातन परब्रह्म को प्राप्त होते है| यज्ञ न करने वाले मनुष्य के लिए तो यह पृथ्वी भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है? इस प्रकार यज्ञ, बहुत तरह से ब्रह्मा के मुख से (वेदों में) विस्तार से कहे गए है| उन सबको तुम (मन, इन्द्रिय और शरीर की) क्रिया द्वारा सम्पन्न होने वाले जानकर और उनके अनुष्ठान द्वारा कर्म – बंधन से मुक्त हो जाओ|

English Meaning – O best of the Kurus, Arjuna! Yogis who experience the nectar left over from Yagya attain the eternal Supreme Brahma. Even if this earth is not pleasant for a person who does not perform Yagya, then how can the next world be pleasant? Thus Yagya has been described in detail in many ways from the mouth of Brahma (in the Vedas). By knowing them all to be accomplished by the actions (of the mind, senses and body) and by performing their rituals, they become free from the bondage of karma.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (33 – 34)

श्रेयान्द्रव्यमयाद्य ज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥

हिंदी अर्थ – हे परंतप अर्जुन ! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है क्योंकि सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते है| उस ज्ञान को तुम तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर जानो | उनको दण्डवत् प्रणाम करने से, सेवा करने से और सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे तुम्हे उसका उपदेश करेंगे|

English Meaning – Oh great Arjun! Yagya of knowledge is better than material yagya because all actions end in knowledge. Learn that knowledge by going to knowledgeable wise people. By paying obeisance to him, by serving him and by asking simple questions, he will teach you the same.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (35 – 36)

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! जिसको जानकर फिर तुम इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगे| जिस ज्ञान द्वारा तुम सम्पूर्ण भूतों को पहले अपने में और फिर मुझ (परमात्मा) में देखोगे| यदि तुम अन्य सभी पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तो भी इस ज्ञान रूपी नाव द्वारा नि:संदेह पाप – समुद्र को पार कर लोगे|

English Meaning – Hey Arjun! Knowing this, you will no longer be tempted like this. Through this knowledge you will see all the beings first in yourself and then in me (God). Even if you are more sinful than all other sinners, you will undoubtedly cross the ocean of sins with this boat of knowledge.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (37 – 38)

यथैधांसि समिद्धोऽग्नि र्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! जिस प्रकार अग्नि लकड़ियों को जला देती है, उसी प्रकार ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को जला देती है| इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है| उस ज्ञान को कर्म योग के द्वारा सिद्ध हुआ मनुष्य, कुछ समय पश्चात अपने आप में ही पा लेता है|

English Meaning – Hey Arjun! Just as fire burns wood, similarly the fire of knowledge burns all the deeds. There is nothing in this world that purifies like knowledge. A man who has attained perfection through Karma Yoga attains that knowledge within himself after some time.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (39 – 40)

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम चिरेणाधिगच्छति॥
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥

हिंदी अर्थ – निरंतर प्रयत्न करने वाला, इन्द्रिय संयम करने वाला और श्रद्धा से युक्त मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है| ज्ञान को प्राप्त होकर वह शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है| विवेकहीन, श्रद्धारहित और संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से भ्रष्ट हो जाता है| उसके लिए न यह लोक सुखप्रद है और न ही परलोक|

English Meaning – A person who makes continuous efforts, controls his senses and has faith attains knowledge. After attaining knowledge he soon attains supreme peace. A man without a conscience, without faith and full of doubt gets corrupted by charity. Neither this world nor the next world is pleasant for him.

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (41 – 42)

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय॥
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमा तिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥

हिंदी अर्थ – हे धनंजय ! कर्म योग से सभी कर्मों को परमात्मा में अर्पण करने वाले, विवेक द्वारा समस्त संशयो का नाश करने वाले और अपने वश में किये हुए अंत:करण वाले मनुष्य को कर्म नहीं बांधते | इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन ! तुम हृदय में स्थित, अपने इस अज्ञानजनित संशय का, ज्ञान रूपी तलवार द्वारा छेदन करके कर्म योग में स्थित हो कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ|

English Meaning – Hey Dhananjay! Karma does not bind the person who offers all his actions to God through Karma Yoga, who destroys all doubts through conscience and who has his conscience under his control. Therefore, O Arjun of Bharatvansh! You pierce this ignorance-born doubt of yours in your heart with the sword of knowledge and stand in Karma Yoga for the battle.


 

| भगवद गीता चतुर्थ अध्याय समाप्त |

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