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Bhagavad Gita Chapter 14: भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय अर्थ सहित

99Pandit Ji
Last Updated:January 16, 2024

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क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 14) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 14) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय

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Chapter 14 – गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya VibhagYog)


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (1-2)

श्रीभगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए है| इस ज्ञान को आश्रय करके अर्थात धारण करके मेरे स्वरुप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते|

English Meaning – Shri Bhagwan said – I will again tell you about that ultimate knowledge which is the best among all the knowledges, knowing which all the sages have become free from this world and have attained the supreme accomplishment. By taking shelter of this knowledge i.e. by imbibing it, the people who attain my form are not reborn in the beginning of creation and do not get troubled even in the time of destruction.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (3-4)

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! मेरी महत-ब्रह्मरूप मूल-प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात गर्भाधीन का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदायरूप गर्भ को स्थापन करता हूँ| उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है| हे अर्जुन ! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते है, प्रकृति तो उन सबकी गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ|

English Meaning – Hey Arjun! My Mahat-Brahma form basic nature is the vagina of all the beings, that is, the place of the pregnant and I establish the womb in the form of a conscious community in that vagina. All the ghosts are born from the combination of that inanimate and animate. Hey Arjun! Nature is the mother who conceives all the idols i.e. embodied beings that are born in different types of species and I am the father who plants the seeds.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (5-6)

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण – ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बांधते है| हे निष्पाप ! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख के सम्बन्ध से और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात उसके अभिमान से बांधता है|

English Meaning – Hey Arjun! Sattva Guna, Rajo Guna and Tamo Guna – these three qualities generated by nature bind the indestructible soul in the body. O innocent one! Among those three qualities, Sattva Guna, being pure, is illuminating and free from disorders, it binds us in the relationship of happiness and in the relationship of knowledge, that is, in its pride.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (7-8)

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस् तन्निबध्नाति भारत ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान| वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फल के सम्बन्ध में बांधता है| हे अर्जुन ! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान| वह इस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निंद्रा द्वारा बांधता है|

English Meaning – Hey Arjun! Know that Rajogun, the form of passion, is born out of desire and attachment. He binds this soul in relation to his actions and their results. Hey Arjun! The Tamo Guna, which fascinates all body-conscious people, is known to be born out of ignorance. He binds this soul through carelessness, laziness and sleep.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (9-10)

सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढँककर प्रमाद में भी लगाना है| हे अर्जुन ! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है अर्थात बढ़ता है|

English Meaning – Hey Arjun! Sattva guna is used in happiness and Rajogun in action and Tamo guna has to be used in carelessness even after covering the knowledge. Hey Arjun! By suppressing Rajogun and Tamogun, Sattvagun is formed, by suppressing Sattvagun and Tamogun, Rajogun, similarly by suppressing Satvagun and Rajogun, Tamogun is formed i.e. increases.

भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय

भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (11-12)

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्वि वृद्धं सत्त्वमित्युत ॥
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥

हिंदी अर्थ – जिस समय इस देह में तथा अंत:करण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है,उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है| हे अर्जुन ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृति, स्वार्थबुद्धि से कर्मों का सकामभाव से आरम्भ, अशांति और विषय भोगों की लालसा – ये सब उत्पन्न होते है|

English Meaning – At the time when consciousness and discrimination power arises in the body, conscience and senses, at that time it should be known that the Sattva Guna has increased. Hey Arjun! With the increase of Rajogun, greed, tendency to selfishness, initiation of actions with a sense of purpose, restlessness and craving for sensual pleasures – all these arise.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (13-14)

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकान मलान्प्रतिपद्यते ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! तमोगुण के बढ़ने पर अन्त:करण और इन्द्रियों में अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मों में अप्रवृति और प्रमाद अर्थात् व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्त:करण की मोहिनी वृत्तियाँ – ये सब ही उत्पन्न होते है| जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालो के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है|

English Meaning – Hey Arjun! With the increase of Tamoguna, darkness in the conscience and senses, disinterest in duties and carelessness i.e. useless efforts and sleep etc., all these arise. When this man dies in the growth of Sattva Guna, then those who do good deeds reach the pure divine heavenly worlds.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (15-16)

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखम ज्ञानं तमसः फलम् ॥

हिंदी अर्थ – रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़योनियों में उत्पन्न होता है| श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात सुख,ज्ञान और वैराग्यादी निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है|

English Meaning – With the increase of Rajoguna, after attaining death, it is born in humans who are attached to deeds and with the increase of Tamoguna, a dead person is born in the worlds of insects, animals etc. The result of good deeds is called sattvik i.e. happiness, knowledge and the pure result of detachment, the result of rajasic deeds is sorrow and the result of tamasic deeds is ignorance.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (17-18)

सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥

हिंदी अर्थ – सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से नि:संदेह लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद और मोह उत्पन्न होते है और अज्ञान भी होता है| सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते है, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते है और तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते है|

English Meaning – Knowledge arises from Sattva Guna and undoubtedly greed arises from Rajo Guna and ignorance and delusion arise from Tamo Guna and also ignorance. The men situated in Sattva Guna go to the higher worlds like heaven, the Rajas men situated in Rajo Guna remain in the middle i.e., the human world only and the Tamasic men situated in the form of sleep, carelessness and laziness etc. in Tamo Guna go to the lower worlds i.e. to the lower worlds like insects, animals etc. and hells. are received.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (19-20)

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥
गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखै र्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥

हिंदी अर्थ – जिस समय दृष्टातीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यंत परे सच्चिदानन्दघनस्वरुप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस समय वह मेरे स्वरुप को प्राप्त होता है| यह पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है|

English Meaning – When the doer does not see anyone other than the three gunas and knows me as the Supreme Being in the true form beyond all three gunas, at that time he attains my form. By violating these three qualities which are the reason for the origin of the male body, he attains bliss and becomes free from birth, death, old age and all kinds of sorrows.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (21-22)

अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणाने तानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन् गुणानतिवर्तते ॥
श्रीभगवानुवाच प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है तथा हे प्रभो ! मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है? श्री भगवान बोले – हे अर्जुन ! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश को और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृति को तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह को भी न प्रवृत होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत होने पर उनकी आकांक्षा करता है|

English Meaning – Arjun said – What are the characteristics of a person who is beyond these three qualities and what kind of behaviour does he have? O Lord! By what means does a human being transcend these three qualities? Shri Bhagwan said – O Arjun! The man who neither hates the light in the form of sattva guna, the tendency in the form of Rajo guna nor the attachment in the form of tamo guna when they are active nor hates them when they are retired nor aspires for them when they are retired.

भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय

भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (23-24)

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस् तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥

हिंदी अर्थ – जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और गुण ही गुणों में बरतते है – ऐसा समझता हुआ जो सच्चिदानन्दघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहता है एवं उस स्थिति से कभी विचलित नहीं होता| जो निरंतर आत्म भाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निंदा स्तुति में भी समान भाव वाला है|

English Meaning – The one who is situated like a witness cannot be disturbed by the qualities and understands that the qualities are the qualities – the one who remains united in the true God and never deviates from that state. One who is constantly situated in the sense of self, who considers sorrow and happiness equally, who has equal feelings towards soil, stone and gold, who is wise, considers the beloved and the unpleasant equally and who has equal feelings even in his praise and criticism.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (25-26)

मानापमानयोस् तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

हिंदी अर्थ – जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है| और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग द्वारा मुझको निरंतर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभांति लांघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता है|

English Meaning – The person who is equal in respect and insult, is equal in favour of friend and foe and is free from the pride of being a doer in all the beginnings, that person is called Gunatit. And the person who continuously worships me through unadulterated bhakti yoga also becomes eligible to attain Sachchidanandaghan Brahma by transcending these three qualities.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (27)

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम मृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥

हिंदी अर्थ – क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखंड एकरस आनंद का आश्रय मैं हूँ|

English Meaning – Because I am the shelter of that imperishable Supreme Brahma and of nectar and of eternal religion and unbroken and constant bliss.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय समाप्त

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