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Bhagavad Gita Chapter 15: भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय अर्थ सहित

99Pandit Ji
Last Updated:January 18, 2024

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क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 15) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 15) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय

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Chapter 15 – पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (1-2)

श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमधःशाखम श्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – आदिपुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले और ब्रह्मा रूप मुख्य शाखा वाले जिस संसार रूप पीपल वृक्ष को अविनाशी कहते है तथा वेद जिसके पत्ते कहे गए है, उस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूलसहित सत्त्व को जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है| उस संसार वृक्ष की तीनों गुणोंरूप जल के द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय-भोग रूप कोंपलोंवाली देव, मनुष्य और तिर्यक् आदि योनिरूप शाखाएँ नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई है तथा मनुष्य लोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली अहंता-ममता और वासना रूप जड़े भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रही है|

English Meaning – Shri Bhagwan said – The world form the Peepal tree which is called imperishable and whose leaves are called Vedas, having the origin in the form of Adipurusha God and the main branch in the form of Brahma, the one who knows the essence of Sattva along with the Purusha root, can understand the meaning of the Vedas. I am going to know. The branches of that world tree, which have grown through water in the form of three gunas and have buds in the form of sensual pleasures, gods, human beings and oblique etc., are spread everywhere below and above, and the roots in the form of ego, attachment and lust, which bind the human world according to their deeds, are also below. And above it is spreading all over the world.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (3-4)

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥

हिंदी अर्थ – इस संसार रूपी वृक्ष का स्वरुप जैसा बताया गया है वैसा यहाँ विचार काल में नहीं पाया जाता है|क्योंकि न तो इसका आदि है और न अंत है तथा न इसकी अच्छी प्रकार की स्थिति है| इसलिए इस अहंता, ममता और वासनारूप अति दृढ मूलों वाले संसार रूप पीपल के वृक्ष को दृढ वैराग्य रूप शास्त्र द्वारा काटकर उसके पश्चात उस परम-पदरूप परमेश्वर को भलीभांति खोजना चाहिए, जिसमे गए हुए पुरुष पुनः इस संसार में लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से इस पुरातन संसार वृक्ष की प्रवृति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष नारायण के मैं शरण हूँ – इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वर का मनन और निदिध्यासन करना चाहिए|

English Meaning – The form of the tree of this world as described here is not found in the time of thought because it neither has a beginning nor an end nor does it have a good state. Therefore, this Peepal tree of the world, which has very strong roots in the form of egoism, attachment and lust, should be cut down through the scriptures in the form of strong dispassion and after that one should thoroughly search for that supreme form of God, in whom the men who have gone do not come back to this world again and in whom The tendency of this ancient world tree to expand has been received from God, I take refuge in the same Adipurush Narayana – in this way, with a strong determination, one should meditate and meditate on that God.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (5-6)

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥

हिंदी अर्थ – जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है| जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरुप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएं पूर्ण रूप से नष्ट हो गई है – वे सुख-दुःख नामक से विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते है| जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चंद्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम है|

English Meaning – Whose respect and attachment have been destroyed. Those who have conquered the defect of attachment, who have a constant state in the form of God and whose desires have been completely destroyed – those knowledgeable people who are free from the so-called pleasures and pains, attain that imperishable supreme state. Neither the sun, nor the moon, nor even fire can illuminate that supreme state, the light of which humans do not return to this world, that is my ultimate abode.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (7-8)

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहित्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥

हिंदी अर्थ – इस शरीर में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है और वही इन प्रकृति में स्थित मन और पांचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है| वायु गंध के स्थान से गंध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है – उसमे जाता है|

English Meaning – This soul in this body is my eternal part and it attracts the mind and the five senses located in this nature. Just as the air absorbs the smell from the place of smell, in the same way, the physical master soul also absorbs the senses along with the mind from the body which it leaves and then goes into the body which it receives.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (9-10)

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥

हिंदी अर्थ – यह जीवात्मा श्रोत, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके – अर्थात इन सबके सहारे से ही विषयों का सेवन करता है| शरीर को छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को अथवा विषयों को भोगते हुए को इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानीजन नहीं जानते, केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले विवेकशील ज्ञानी ही तत्त्व से जानते है|

English Meaning – This living soul consumes the objects by taking shelter of the source, eyes and skin and with the help of taste, smell and mind – that is, with the help of all these. Ignorant people do not know the one leaving the body or the one present in the body or the one enjoying the objects. Thus, even the ignorant people do not know the one having all three qualities; only the discriminating knowledgeable ones with the eyes of knowledge know it from the element.

भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय

भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (11-12)

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥

हिंदी अर्थ – यत्न करने वाले योगीजन भी अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को तत्त्व से जानते है, किन्तु जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते है| सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चंद्रमा में है और जो अग्नि में है – उसको तू मेरा ही तेज जान|

English Meaning – Yogis who make efforts also know this soul present in their heart in principle, but those who have not purified their conscience, such ignorant people do not know this soul even after making efforts. The glory that is present in the Sun illuminates the whole world, the glory that is in the Moon and the glory that is in the fire – you know that to be my glory.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (13-14)

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥

हिंदी अर्थ – और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति में सब भूतों को धारण करता हूँ और रस्स्वरूप अर्थात अमृतमय चंद्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ| मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्निरूप होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ|

English Meaning – And I, entering the earth, hold all the ghosts under my power and in the form of essence i.e. nectar-filled moon, I nourish all the medicines i.e. plants. I am the one present in the bodies of all living beings, combined with Prana and Apana, in the form of Vaishwanar Agni, who digests the four types of food.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (15-16)

सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥

हिंदी अर्थ – मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अंतर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ| इस संसार में नाशवान और अविनाशी भी ये दो प्रकार के पुरुष है| इनमे सम्पूर्ण भूतप्राणियों के शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है|

English Meaning – I am the one who is present internally in the heart of all living beings and it is from me that memory, knowledge and education take place and I am the only one capable of being known through all the Vedas and I am the doer of Vedanta and the knower of the Vedas. There are two types of men in this world, perishable and immortal. In these, the bodies of all the living beings are said to be perishable and the soul is said to be indestructible.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (17-18)

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
यस्मात्क्षरमतीतो ऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प् रथितः पुरुषोत्तमः ॥

हिंदी अर्थ – इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा – इस प्रकार कहा गया है| क्योंकि मैं नाशवान जड़वर्ग – क्षेत्र से तो सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ|

English Meaning – There is someone else who is better than these two, who enters all three worlds and sustains everyone and is the imperishable God and Supreme Soul – it has been said thus. Because I am completely beyond the perishable material world and am better than the immortal soul, hence I am famous in the world and in the Vedas by the name Purushottam.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (19-20)

यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
इति गुह्यतमं शास्त्र मिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्‌बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥

हिंदी अर्थ – भारत ! जो ज्ञानी पुरुष मुझको इस प्रकार तत्त्व से पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरंतर मुझ वासुदेव परमेश्वर को ही भजता है| हे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार यह अति रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको तत्त्व से जानकार मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है|

English Meaning – Bharat ! The knowledgeable person who knows me to be the Supreme Being by nature, that omniscient person continuously worships me, Lord Vasudev, in every way. O sinless Arjun! I have told this very mysterious confidential scripture in such a way that a person who knows it in principle becomes knowledgeable and fruitful.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय समाप्त

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